PROFILE : यादों का सफर
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Jayshree Pophale
Mr. Bharat Pophale
- Birthday: 23 October
- Anniversary: 26 May
- Malegaon (MH)

यादों का सफर - प्रकरण ४०
मैं, कॉलेज समय की जयश्री महाजन आज जयश्री भरत पोफले के नाम से जानी जाती हु। आप सभी की यादें पढ़कर मन बहुत खुश हुआ। हर किसी ने अपनी स्मृतियाँ इतने सुंदर ढंग से लिखी हैं कि उन्हें पढ़ते हुए मुझे यह डर लगने लगा कि मैं शायद इतनी अच्छी तरह अपनी बात नहीं लिख पाऊँगी। इतने वर्षों से महाराष्ट्र में रहने के कारण मेरी मराठी तो अच्छी हो गई, लेकिन हिंदी थोड़ी कमजोर हो गई थी। 9वी कक्षा तक मराठी फिर HSC तक हिंदी फिर कॉलेज में इंग्लिश माध्यम रहा था और कॉलेज में गुजराती सहेलियों से मिलाप हुआ.. जिससे गुजराती भाषा से भी मेरा साक्षात्कार हो गया। मराठी में कहावत “एक न धड़ – बाराभर चिंध्या” … जैसी कही मेरी लिखावट खिचड़ी न बन जाए इस बात का ध्यान रखते हुए मन में साहस जुटाकर मैंने भी अपनी यादों को काग़ज़ पर उतारने का प्रयास किया।
कॉलेज का पहला साल, पहली ही क्लास बालकनी वाली थी। माहौल में रैगिंग की हल्की-सी दहशत फैली रहती थी। सीनियर्स रोज़ क्लास में आकर किसी न किसी को कॉलेज छूटने के बाद बुला लेते थे। एक दिन मेरा भी नंबर आ गया। कॉलेज पाँच बजे छूटता था और मैं उस दिन घर साढ़े छह बजे पहुँची। मम्मी ने डाँट दिया कि इतनी देर क्यों हो गई? (क्योंकि हमें सात बजे तक ही बाहर रहने की अनुमति थी)। मेरी दीदी ने समझाया कि यह सब रैगिंग की वजह से हुआ होगा, तब जाकर मम्मी का गुस्सा शांत हुआ।
फर्स्ट ईयर में ज़ूलॉजी की क्लास चल रही थी। मैं, ममता श्रोफ और ममता जैन तीनों छठी बेंच पर बैठते थे। पता नहीं उस दिन क्या हुआ, मुझे बार-बार हँसी आ रही थी। जेलिस मैडम की नज़र मुझ पर पड़ गई। उन्होंने मुझे बुलाकर डांटा और पास के ही खड़ा कर दिया। मैं तो बहुत ही थरथर कांप रही थी। डर सजा का नही था, परंतु क्लास के अपरिचित लड़के लड़कियों के सामने बूत बनकर संकोच हो रहा था। तब मैं नही जानती थी कि मेडम कबतक खड़ा रखेगी, पर मेरे भाग्य से पांच सात मिनट में ही बेल बज गई, मैने फिर मेडम को सोरी कहा और मैं बड़ी सज़ा से बच गई। दूसरे दिन सब नार्मल रहा।
डिसेक्शन से मुझे बहुत डर लगता था। उस कारण कई बार ठीक से खाना भी नहीं खा पाती थी और चम्मच से ही खाना खाती थी। यह बात हमारे एक शिक्षक को भी मालूम हो गई थी। एक दिन क्लास में सिद्धिक सर आए और कहा, “महाजन, कल डिसेक्शन है, हाथों पर अच्छे से बैंडेज बाँधकर आना।” उनकी यह बात आज भी याद आती है, क्योंकि उनके कहने में अपनापन भी छिपा था।
बॉटनी प्रैक्टिकल की एक याद आज भी बहुत साफ़ है। उस समय मेरे पास घड़ी नहीं थी। हमारे यहाँ रिवाज था कि ग्रेजुएट होने पर ही घड़ी मिलती थी। लेकिन स्लाइड स्टेनिंग के लिए समय देखना ज़रूरी होता था। मेरी क्लासमेट के पास घड़ी थी। जब भी उसका स्टेनिंग पूरा हो जाता, वह अपनी घड़ी मुझे दे देती थी। हम दोनों के बीच आपसी समझ थी। हमारे रोलनंबर के हिसाब से एक सहपाठी लड़का भी था जो ज़रूरत पड़ने पर अपनी घड़ी हमारे बीच रख देता था।
ग्रेजुएशन के बाद मुझे दो घड़ियाँ मिलीं। बी.एससी. का रिज़ल्ट आने पर पापा ने एक घड़ी दी और भैया सिंगापुर से एक घड़ी लेकर आए। वो घड़ी आज भी
मेरी स्मृति में यादों के साथ चलती है।
थर्ड ईयर की एक याद मैं ज़रूर साझा करना चाहती हूँ। केमिस्ट्री का फ़ाइनल प्रैक्टिकल था, डबल टाइट्रेशन करना था। कुछ सहपाठियों ने मुझे रीडिंग, केलकुलेशन और रिजल्ट लाकर कहा कि मैं सिर्फ़ रीडिंग और कैलकुलेशन लिखती रहूँ। पहले मैंने वैसा ही किया, लेकिन जब समय मिला तो मैंने खुद टाइट्रेशन करके देखा। मेरी रीडिंग अलग आ रही थी। मैं डर गई, रोने जैसी हालत हो गई।
तभी लैब असिस्टेंट से नई आंसर शीट मंगवाई गई। मैंने फिर से पूरी प्रक्रिया ध्यान से की, सही रीडिंग ली, कैलकुलेशन किया और आत्मविश्वास के साथ आंसर शीट जमा कर दी। उस दिन मुझे खुद पर भरोसा करना सीखने को मिला।
शरुआत में साधना चौरे ने जो सायकल का किस्सा लिखा वो भी शायद सीनियर्स की रैगिंग का ही एक हिस्सा होगा। असल में हमारे सभी सहपाठी बहुत सहयोगी और मददगार स्वभाव के थे, और आज भी हैं।
आज ‘गोल्डन मीट’ को सफल बनाने के लिए आप सभी बहुत मेहनत कर रहे हैं। इसके लिए आप सबको दिल से धन्यवाद। सभी बॉयज़ की मेहनत की वजह से हम सभी गर्ल्स इतने सालों बाद फिर से मिलने वाली हैं।
Thanks to all
—- जयश्री महाजन – पोफले
