PROFILE : यादों का सफर

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Priti Shroff

Mr. Shreeniwas Haribhakti
  • Birthday: 19 April
  • Anniversary: 06 December
  • Kansas City (USA)
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यादों का सफर - प्रकरण ०५ २२ ३१ ३७

०५ 

फिर एक बार मेरी थोड़ी यादें आप सभी से शेयर करते हुए मै काफी एक्साइट हो रही हु….😊

कॉलेज का पहला साल था…नए दोस्त, नई हँसी, नई शरारतें दिल में उत्साह इतना कि लगता था पूरी दुनिया हमारी है। 

कॉलेज को अब तक सिर्फ़ फ़िल्मों में देखा था, जहाँ लड़के-लड़कियों की नोक-झोंक, खींचतान और रूठना-मनाना रोज़ की बात होती है। अब वही सब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन रहा था। लेक्चर की क्लास में बैठने से ज़्यादा मज़ा प्रैक्टिकल में आता था । खासकर जूलॉजी की लैब में, जहाँ डर और रोमांच साथ-साथ चलते थे। डिसेक्शन के लिए समय बहुत कम मिलता था। फ्रॉग, लिज़र्ड, कोकरोच केंचुआ.. के प्रैक्टिकल तय समय में करना पड़ता था सीखपाए या नहीं, किसी को परवाह नहीं… दूसरा मौका तो मिलता ही नहीं था।

 पहला डिसेक्शन फ्रॉग का था। लेकिन हम सब एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए  कभी कोई पूछता, “पहले क्या काटना है?” तो कोई डरते-डरते पीछे हट जाता। और देखते-देखते समय हाथ से निकल गया था। थोड़ा अफ़सोस हुआ… मगर फिर वही हमारी उम्र की शरारत जाग उठी।

मैं, सरोज, पूनम और शायद संगीता सबने आपसमे सलाह की और एक नटखट-सा प्लान बना लिया। लैब के असिस्टेंट को बड़ी मासूमियत से पटाया और फ़ॉर्मेलिन की एक बोतल घर ले आए। मेरे घर के बाहर टॉकीज़ के आँगन में अक्सर मेंढक उछलते-कूदते दिख जाते थे। वहाँ रहने वाले हमारे चौकीदार भैया से कहा “भैया, टीचर ने कहा है… ज़रा मदद कर दो।” वे बड़े सीधे थे तुरंत मान गए और एक मेंढक पकड़ लाए।

घर में सबकी नज़रों से बचाकर मैंने एक छोटी-सी थाली निकाली। उसमें फ़ॉर्मेलिन डाला और हम सबने मिलकर मेंढक को दबोच लिया।

वह थोड़ा छटपटाया… और फिर एकदम शांत हो गया। 

उस समय डर से ज़्यादा जिज्ञासा थी। ये तो स्पष्ट है कि पहली बार में ही हम फ्रॉग का डिसेक्शन पूरी तरह नहीं कर पाए थे। पर हिम्मत खुल गई थी। अतः ये सिलसिला चलता रहा ऐसे प्रयोग करनेका, मजा भी आता था। 

एक बार मेंढक के अंदर से कुछ छोटा-सा, अजीब-सा दिखाई दिया।

 

पहले समझ में नहीं आया  यह क्या है? हमें लगा यह तो बेबी फ्रॉग है 😃😃

किताबें खोलीं, सब पढ़ने लगे कि क्या हो क्या सकता है? काफ़ी उथल-पुथल के बाद पता चला के बेबी फ्रॉग जैसा कुछ होता नहीं, शायद बंच ऑफ एग्स होंगे या कोई पैरासाइट…

एक बार हमने डिसेक्शन की शुरुआत ही की थी के  थोड़ा कटा हुआ भी थाली में से उछल पड़ा और फड़फड़ाता हुआ भाग गया। हम भी घबरा गए थाली वहीं छोड़ दी और जान बचाकर पीछे की ओर दौड़ पड़े।

कुछ देर बाद हँसी थमी, दिल संभला…

आज भी जब हम सहेलियाँ मिलती हैं,

तो यह बात याद आते ही, बेबी फ्रॉग बोलते ही, हँसी अपने-आप फूट पड़ती है। 

यह कोई कहानी नहीं सच्ची हकीकत है।

आप सभी अपनी यादें जरूर लिखे।

अपने जमाने का एक गीत है न…

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

गुजरे हुए वक्त की हर मौज ठहर जाएगी

🙏

– – प्रीति श्रॉफ _हरिभक्त

२२  

यादों के सफ़र में मैं, कॉलेज समयकी प्रीति श्रॉफ, जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो कॉलेज के दिन किसी पुरानी फ़िल्म की तरह सामने आ खड़े होते हैं। 

तीसरा साल रहा होगा। वो  समय, जब बैचमेट सिर्फ़ बैचमेट नहीं थे, पूरी क्लास एक परिवार जैसी थी, ऐसा एहसास दिलाने वाले कुछ सहपाठी थे।

कम बोलने वाले, ज़्यादा करने वाले। एक सहपाठी कभी-कभी घर आता, मगर अंदर आने से पहले ही सर झुकाकर बाहर खड़े रहता। जैसे दरवाज़े से पहले ही संस्कारों की दहलीज़ लाँघ रहा हों।

भाभी हँसते हुए कहतीं,

“प्रीति, तेरा शर्मीला फ्रेंड आया है।”

मैं बस मुस्कुरा देती। क्योंकि वो शर्म नहीं थी, वो उनकी शराफ़त थी बड़ों को सम्मान देने की उनकी सहज आदत।

कॉलेज में भी एक अन्य सहपाठी बिल्कुल वैसे ही थे। रिसेस शुरू होते ही अगर लड़कियों के ग्रुप में “आज कुछ चटपटा खाने का मन हो तो…”

तो हमें वह सहपाठी ही याद आते

समोसे-कचौरी लिए तुरंत हाज़िर हो जाते।

किसी की साइकिल की चैन उतर गई हो, तो  सहपाठी अपने हाथ गंदे करके भी चैन चढ़ा देते। और फिर ऐसे खड़े हो जाते जैसे कुछ हुआ ही न हो। कभी इस बात का ओब्लिगेशन महसूस नहीं होने देते।

मुझे लगता है कि साधना के सायकल की हवा अन्य फैकल्टीवाले/क्लासवाले निकालते होंगे।

कभी किसी लड़की की कॉपी घर छूट गई, कभी किसी को प्रैक्टिकल की फाइल चाहिए अगर ये बात  सहपाठी के कानों तक पहुँच जाए, तो समझो काम हो गया। वो फौरन कर देते।

जैसा कि सरोज ने लिखा है वो दौर ऐसा था जब आज की तरह मोपेड, स्कूटी या ऑटो-रिक्शा आसानी से उपलब्ध नहीं थे।

एक बार ग्रुप की एक लड़की बीमार थी और तीन चार दिन कॉलेज नहीं आ पाई। जी दिन  कॉलेज आई उसके लिए नोट्स तैयार कर एक सहपाठी के हाथ में तैयार थे। और बड़ी विनम्रता से बोला, “कल छूट गया था आपका, शायद आप चिंतित हो।”

और वो दिन तो आज भी याद है, जब मेरा पेन खो गया था। मैंने ढूँढा, दोस्तों ने ढूँढा, फिर बात आई-गई हो गई।

शाम को दरवाज़े पर वही दृश्य…

सर झुकाए एक सहपाठी खड़ा था।

हाथ में मेरा पेन लिए

 “ये… मिल गया,”

बस इतना ही कहा। तब मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन आज सोचती हूं कि यह उनकी सौजन्यता थी।🙏

 *सचमुच, वे बहुत ही कोऑपरेटिव थे।* उन सभी का  हम तब तो फॉर्मली थैक्स करते थे, लेकिन मैं आज सचमुच हृदय से धन्यवाद करती हूं।

तब भी हमें अपने बैचमेट्स पर गर्व था, और आज भी है। क्योंकि 

हमारी क्लास वाकई सबसे अलग थी। 

आज जब ज़िंदगी अपने-अपने रास्तों पर बहुत आगे निकल आई है, तो ये छोटे-छोटे किस्से भी बहुत बड़े लगते हैं.

प्रीती श्रॉफ 12.16.2025

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फिर एक बार मेरी थोड़ी यादें आप सभी से शेयर करते हुए मै काफी एक्साइट हो रही हु….😊

कॉलेज का पहला साल था…नए दोस्त, नई हँसी, नई शरारतें दिल में उत्साह इतना कि लगता था पूरी दुनिया हमारी है। 

कॉलेज को अब तक सिर्फ़ फ़िल्मों में देखा था, जहाँ लड़के-लड़कियों की नोक-झोंक, खींचतान और रूठना-मनाना रोज़ की बात होती है। अब वही सब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन रहा था। लेक्चर की क्लास में बैठने से ज़्यादा मज़ा प्रैक्टिकल में आता था । खासकर जूलॉजी की लैब में, जहाँ डर और रोमांच साथ-साथ चलते थे। डिसेक्शन के लिए समय बहुत कम मिलता था। फ्रॉग, लिज़र्ड, कोकरोच केंचुआ.. के प्रैक्टिकल तय समय में करना पड़ता था सीखपाए या नहीं, किसी को परवाह नहीं… दूसरा मौका तो मिलता ही नहीं था।

 *पहला डिसेक्शन फ्रॉग का था।* लेकिन हम सब एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए  कभी कोई पूछता, “पहले क्या काटना है?” तो कोई डरते-डरते पीछे हट जाता। और देखते-देखते समय हाथ से निकल गया था। थोड़ा अफ़सोस हुआ… मगर फिर वही हमारी उम्र की शरारत जाग उठी।

मैं, सरोज, पूनम और शायद संगीता सबने आपसमे सलाह की और एक नटखट-सा प्लान बना लिया। लैब के असिस्टेंट को बड़ी मासूमियत से पटाया और फ़ॉर्मेलिन की एक बोतल घर ले आए। मेरे घर के बाहर टॉकीज़ के आँगन में अक्सर मेंढक उछलते-कूदते दिख जाते थे। वहाँ रहने वाले हमारे चौकीदार भैया से कहा “भैया, टीचर ने कहा है… ज़रा मदद कर दो।” वे बड़े सीधे थे तुरंत मान गए और एक मेंढक पकड़ लाए।

घर में सबकी नज़रों से बचाकर मैंने एक छोटी-सी थाली निकाली। उसमें फ़ॉर्मेलिन डाला और हम सबने मिलकर मेंढक को दबोच लिया।

वह थोड़ा छटपटाया… और फिर एकदम शांत हो गया। 

उस समय डर से ज़्यादा जिज्ञासा थी। ये तो स्पष्ट है कि पहली बार में ही हम फ्रॉग का डिसेक्शन पूरी तरह नहीं कर पाए थे। पर हिम्मत खुल गई थी। अतः ये सिलसिला चलता रहा ऐसे प्रयोग करनेका, मजा भी आता था। 

एक बार मेंढक के अंदर से कुछ छोटा-सा, अजीब-सा दिखाई दिया।

पहले समझ में नहीं आया  यह क्या है? हमें लगा यह तो बेबी फ्रॉग है 😃😃

किताबें खोलीं, सब पढ़ने लगे कि क्या हो क्या सकता है? काफ़ी उथल-पुथल के बाद पता चला के बेबी फ्रॉग जैसा कुछ होता नहीं, शायद बंच ऑफ एग्स होंगे या कोई पैरासाइट…

एक बार हमने डिसेक्शन की शुरुआत ही की थी के  थोड़ा कटा हुआ भी थाली में से उछल पड़ा और फड़फड़ाता हुआ भाग गया। हम भी घबरा गए थाली वहीं छोड़ दी और जान बचाकर पीछे की ओर दौड़ पड़े।

कुछ देर बाद हँसी थमी, दिल संभला…

आज भी जब हम सहेलियाँ मिलती हैं,

तो यह बात याद आते ही, बेबी फ्रॉग बोलते ही, हँसी अपने-आप फूट पड़ती है। 

यह कोई कहानी नहीं सच्ची हकीकत है।

आप सभी अपनी यादें जरूर लिखे।

अपने जमाने का एक गीत है न…

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

गुजरे हुए वक्त की हर मौज ठहर जाएगी

🙏

– – प्रीति श्रॉफ _हरिभक्त

३७ 

यादों के इस सफर में पूनम का किस्सा पढ़कर मुझे भी अपना एक मजेदार अनुभव याद आ गया, जिसे पढ़कर शायद आप भी हँसते हँसते लोटपोट हो जाओगे। यह बात हमारे कॉलेज के दूसरे साल की है, जब हम सब कॉलेज टूर पर दार्जलिंग गए थे। हम सहेलियाँ वैसे ही मस्तीखोर थीं और पूरे टूर में परिहार मैडम के साथ रहीं, उनका ख्याल भी रखा और उन्हें थोड़ा बहुत परेशान भी किया था। हमारी लीडर कल्पना जरीवाला थी। मैं, सरोज, पूनम और कल्पना और दो सहेलियों हमेशा साथ ही रहते थे।

ट्रेन के सफर में खड़गपुर स्टेशन आने वाला था। टूर पर जाने से पहले लोगों ने हमें खूब डराया था कि वहाँ बहुत गुंडे होते हैं, ट्रेन रोककर माल सामान लूट लेते हैं। हमारी ट्रेन रात में वहाँ से गुजरने वाली थी। डर के मारे हम सब सहेलियाँ एक जगह सिमट कर बैठ गईं थी। एक दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया और जिसके हाथ जो आया, किसी ने डब्बा पकड़ा, किसी ने लकड़ी और किसी ने बैग थाम लिया था। बाहर चारों तरफ घुप अंधेरा था। खड़खड़ करती ट्रेन की आवाज के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। अंधेरे में कब स्टेशन आया और कब निकल गया, हमें पता ही नहीं चला। जब अगला स्टेशन आया तब जाकर जान में जान आई। फिर तो हम सब निडर बनकर हँसते हुए अपने अपने बर्थ पर जा बैठे।

दार्जलिंग पहुँचकर होटल में तैयार हुए और फिर सब दार्जलिंग की सड़कों पर घूमने निकल पड़े। मैं, पूनम और सरोज और दो सहेलियां हमेशा साथ रहते थे। एक दूसरे का हाथ पकड़कर, इधर उधर हिलते डुलते, हिल स्टेशन की ठंडी हवा और खूबसूरती का पूरा मजा ले रहे थे। चलते चलते बातें करते हुए पता ही नहीं चला कि कब एक सहेली का हाथ छूट गया और उसने हमारे हाथ समझकर साथ में चल रहे एक लड़के का हाथ पकड़ लिया और बिल्कुल बेफिक्र होकर हँसते हुए उससे बातें करती हुई आगे चलती रही थी।

हम बाकी की सहेलियाँ जो पीछे थीं, अपनी हँसी बड़ी मुश्किल से दबाते हुए चुपचाप उसके पीछे चलने लगीं। जिस लड़के का हाथ उसने पकड़ा था, वह भी पूरे मजे में हमारे साथ चलता जा रहा था। थोड़ी देर बाद उस सहेली को अजीब लगा कि बाकी सहेलियाँ कुछ बोल ही क्यों नहीं रही हैं। उसने पीछे मुड़कर देखा तो समझ में आया कि सहेलियों का हाथ कब और कैसे बदल गया था। यह एहसास होते ही उसने झटके से हाथ छुड़ाया और भागकर हमारे पास आ गई।

उसका चेहरा ऐसा हो गया जैसे अभी रो ही देगी। उसका वो हाल देखकर हमारी हँसी ऐसे गायब हो गई थी जैसे तोते के सिर से सींग। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला और हम चुपचाप चलते रहे। सहेली का गुस्सा भी थोड़ी देर तक बना रहा। हम सहेलियों ने बिना गलती के भी उससे माफी माँगी, बस इसलिए कि हमारी दोस्त मान जाए। फिर क्या था, थोड़ी ही देर में सब ठीक हो गया और पूरे रास्ते हमारी हँसी के ठहाके गूंजते रहे, जो आज भी याद करने पर रुकने का नाम नहीं लेते।

यह प्रकरण पढ़ने के बाद हँसना मना है और यह जानना भी मना है कि वह सहेली कौन थी।

– – प्रीति श्रॉफ

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