PROFILE : यादों का सफर
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Rajeev Khedakar
Mrs. Alka R Khedkar
- Birthday: 10 October
- Anniversary: 04 May
- Burhanpur (MP)

यादों का सफर - प्रकरण २३ ३४
स्मृतियों की एक खिड़की से…
राजीव खेडकर “सौरभ”
# दिसंबर-जनवरी की ठंड।
सूर्य की पुत्री ताप्ती नदी के किनारे स्थित राजसी किले की प्राचीरों पर ठंडी हवा बह रही थी।
एनसीसी परेड ग्राउंड की घास पर ओस की बूँदें पड़ रही थीं, जिससे ठंड और बढ़ रही थी। हम कैडेट आपस में बातें कर रहे थे, तभी एनसीसी अधिकारी श्री आर.यू. खान मैदान पर पहुँचे।
36वीं एमपी बटालियन के अंडर ऑफिसर रूप में, मैंने सलामी दी और परेड आयोजित करने की अनुमति मिलने के बाद परेड शुरू हुई।
सेना के मेजर थापा भी आ गए। परेड, जोश से भरी हुई, अटेंशन, रेस्ट, मार्च पास्ट तेज चलने के आदेशों के साथ परेड गति पकड़ती गई और ठंड गायब हो गई। इसी बीच, बगल की सड़क से छात्र-छात्राएं कॉलेज की ओर जा रहे थे, कुछ पैदल और कुछ साइकिल पर। तभी सड़क से आती हुई खिलखिलाती हंसी की आवाज ने मेरा ध्यान खींचा… मैंने देखा… वे मेरी कक्षा की तीन छात्राएँ थीं जो साइकिल पकड़कर चल रही थीं। मैं थोड़ा हिचकिचाते हुए मुस्कुराया। आगे दो बॉस, बगल में तीन गर्ल्स, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
परेड समाप्त हो गई, लेकिन वे तीनों मुस्कुराते चेहरे मेरी स्मृति पटल में थे । मैं परेड ग्राउंड से हॉस्टल की ओर भागा, अपनी कमीज़ बदली, मैंने एनसीसी की पैंट पहनी हुई थी, मुझे क्लास के लिए देर हो रही थी, श्री नागर सर की क्लास थी।
क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?
सर ने अनुमती दी, तथा आर्मी कैम्प करके आने की बधाई दी पूरी क्लास ने ताली बजाकर उत्साहित किया, इसी उत्साह एव उस खिलखिलाहट भरी हँसी की बदौलत मैंने दो बार थल सेना में भर्ती का प्रयास किया कारणवश नहीं जा पाया l आकाशवाणी छतरपुर FM में चयन के बाद ही प्रसार भारती विवाद के कारण ज्वाईन नहीं किया l
आज भी सेना में ना जाने का मन मे मलाल है।
मित्रों..जीवन चलने का नाम..
चलते रहो सुबह शाम…….I
— राजीव खेडेकर “सौरभ”

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😄 गोल्डन मीट के कारण स्मृतियों के पन्नों से संस्मरण शब्दों मे बंधकर यादो के झरोखों के रूप में साथियों द्वारा लिखे जा रहे हैं, यदि ये ना होता तो ये यादे , ये किस्से ,कहानियां समय के साथ-साथ काल – कलवीत हो जाती l ♥️ हृदय की गहराईयों से. लिखे गए ये संस्मरण आज 50 साथी एव उनका परिवार पढ़ रहा है, जिससे मन में खुशी का संचार, नयी ऊर्जा के साथ BP, कंट्रोल हो रहा है, डिजिटल तकनीक से का लाभ हमे मिलेगा और ये भविष्य में पुनः पढ़ सकते है l👍 ऐसी ही एक शरारत का मैं वर्णन करने जा रहा हूं……
बात फर्स्ट ईयर की है, अपनी बालकनी वाला क्लास रूम, घर से पैदल चलकर आए हमारे अनुशासन प्रिय फिजिक्स के प्रोफेसर स्व. श्री नागेश श्रीपत
बोन्डे सर का पीरियड, खुली खिड़कियों से आता सूर्य प्रकाश और प्रकाश (light) पढ़ाते सर …उनका हिन्दी- मराठी – इंग्लिश मिश्रित भाषा में लेक्चर का अंदाज निराला था, वे कोई डायग्राम बोर्ड पर बना रहे थे पीठ हमारी-आपकी ओर थी…मुझे फिजिक्स कठिन लगता था मैं बड़े. ध्यान से नोट कर रहा था l आसपास सन्नाटा, दूर से आती बच्चों की आवाजें….इसी बीच पिछ्ली बेंच से ही हमारे कोई साथी ने 2 ✌️कंचे (बुरहानपुरी में मंज़l) सरकाये जो जो लुढ़कती हुई उपर से नीचे की ओर प्रत्येक पादान से ……..
टप- टप … ,
ट ….. प
-टप ….ट…प….ट…. होते हुए सर के सामने से दरवाजे की ओर गये l जैसे सन्नाटा टूटा आवाज़ आयी सर हमारी ओर मुड़े वे कंचे की प्रत्येक टप-..टप को देखे तब तक दूसरे कंचे फिर टप -टप….
करते नीचे की ओर आ रहे थे, सर की गर्दन प्रत्येक टप ..टप ..पर ऊपर- नीचे , ऊपर-नीचे..हो रही थी, हम सभी भौचक्के, स्तब्ध … कभी कंचो को तो कभी सर को देख रहे थे l शरारती तत्व शांत, क्लास भी शांत l सर ने..गुस्से से डस्टर चाक टेबल पर पटक कर..who are you? कहा l सब एक दूसरे को देख रहे थे…. तभी स्टेंडप के आदेश के. साथ सब खडे हो गए. सर. ने प्रत्येक को अपने चश्मे के पीछे गुस्साई से एक- मिनिट तक देखा… चारो ओर सन्नाटा l कोई प्रतिक्रिया नहीं l
Sit down का आदेश, और कहा सभी को प्रेक्टिकल परीक्षा भी देना है… पीरियड समाप्ति की घंटी से सन्नाटा टूटा…सर क्लास. के बाहर… l शरारत से शरीफ छात्र पीरियड, प्रेक्टिकल की परीक्षा का भय के साथ बातचीत करते तब-तक…दूसरा पीरियड …श्री सलीम सर का शुरू…l 😄
कथा समाप्त..मुस्कराइए 🙏🏻
प्रस्तुति::राजीव खेड़कर “सौरभ “
चित्रांकन: सुमेरसिंह बैस- मुंबई
