PROFILE : यादों का सफर

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Dr Sangeeta Shroff

Dr Mukesh Mehta
  • Birthday: 09 September
  • Anniversary: 11 July
  • Nagpur (MH)
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यादों का सफर - प्रकरण २७

नमस्कार साथियों,

 

हिंदी या इंग्लिश मे मेरे सब्जेक्ट पर या कोई जनरल सब्जेक्ट पर लिखना आसान है लेकिन अपनी यादों को हिंदी में  लिखने में थोड़ी डिफिकल्टी होती है। कई लोगों को 45 साल बाद मेरे जैसा महसूस हुआ होगा। 

फिर मैने सोचा आज मैं बोलूंगी और आप सभी इसे सुनना। यदि इसे पढ़ोगे तो ग्रामर या वाक्य रचना में भूल निकालेंगे।😊 सही बात है न…

 

कुछ जगहें सिर्फ buildings नहीं होतीं, वे हमारी life का हिस्सा बन जाती हैं। भले सिर्फ एक साल के लिए, लेकिन S.G.J.Q. College मेरे लिए ऐसी ही एक जगह थी।

मेरे कैरियर का नींव का पत्थर था।

ये बाते कहने बैठी हु तो मन अपने-आप उन दिनों में लौट गया, जहाँ सपने सिंपल थे और उम्मीदें बहुत बड़ी थी।

 

यहीं से मेरी academic journey ने सही direction पकड़ी। B.Sc. Part-I के दिनों में बुक्स, प्रैक्टिकल्स, लेक्चर्स और एग्जाम के बीच मैंने खुद को धीरे-धीरे डेवलप करते हुए देखा। इसी फाउंडेशन ने आगे चलकर इंदौर मेडिकल कॉलेज तक पहुँचने का रास्ता खोला। उस समय शायद समझ नहीं थी, पर आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस होता है कि बीएससी फर्स्ट इयर ही मेरे लिए टर्निंग पॉइंट था। भले ही मैं सिर्फ एक साल आप लोगो के साथ थी पर वो एक साल बहुत ही मेमोरेबल था। कॉलेज के टीचर्स आज भी आदर के साथ मेरी मेमोरी में है । वे सिर्फ सिलेबस पूरा करने के लिए ही नहीं थे, बल्कि हमें गाइड करने वाले मेंटर्स भी थे। कई बार self-doubt हुआ, fear आया, तब उनके शब्दों ने confidence दिया।

 

आज जब मैं Government Health Service में Blood Bank Officer (Medical Officer) के पद से retire हो चुकी हूँ, तो साफ़ महसूस होता है  की इस पूरे प्रोफेशनल केरियर की स्ट्रेंथ वहीं से आई थी।

 

मेरे friends और बैचमेट्स खासकर पूनम, प्रीति, संध्या, सरोज  इस यात्रा का सबसे सुंदर हिस्सा रहे। साथ पढ़ना, साथ स्ट्रेस शेयर करना, कभी हँसना तो कभी चुपचाप एक-दूसरे का साथ देना….. ये सब रिलेशनशिप किसी टेक्स्ट बुक या क्लास में नहीं सिखाए जाते। मेडिकल कॉलेज के साथी हों या B.Sc. के दोस्त, हर रिश्ता अपने-आप में स्पेशियल था।

आज भी याद है वे छोटी-छोटी बाते….  फ्रेंड्स के साथ मूवी देखना, बिना प्लान के बाहर घूमने निकल जाना, खान भाई की  ice-cream, कमल का सोडा/लस्सी और लास्ट बेंच पर बैठकर endless बातें करना। उस समय ये सब बहुत नॉर्मल लगता था, पर आज समझ में आता है कि वही पल असल में बेशकीमती थे।

 

आज life बहुत organized है responsibilities हैं, schedules हैं, duties हैं। लेकिन उन दिनों की simplicity और warmth आज भी मन के किसी soft corner में सुरक्षित है। शायद वही memories आज भी मुझे emotionally grounded रखती हैं।

 

 यह प्रकरण मेरे past को

एक silent thank-you है 

उन दिनों को, उन लोगों को

और 

उस खुद को, जिसने बिना जाने future की foundation रख दी थी।

 

 — संगीता श्रॉफ – मेहता

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