PROFILE : यादों का सफर

39

Saroj Shroff

Mr. Madan Mohan Parekh
  • Birthday: 06 August
  • Anniversary: 06 February
  • Varanasi (UP)
39 sarojparekh

यादों का सफर - प्रकरण ०४ २८ ४१

०४ 

मै सरोज श्रॉफ –पारेख फिर से एक यादों का प्रकरण लिख रही हु। यह प्रकरण पढ़कर आप सब लोग क्या सोचोगे इस विचार से लिखते हुए थोड़ी झिझक हो रही थी।पर फिर याद आया इस ग्रुप में तो सभी शरारती है, शायद  मै शरुआत करूं तो बाकी साथी भी अपनी शरारतें बेझिझक कहने लगे।

इस प्रकरण में सिर्फ नादानियत की घटना है। किसी के प्रति अनादर नहीं है।

तो दोस्तो,

हमारी उम्र तब कोई सत्रह बरस की रही होगी। तब न ज़िम्मेदारियों का बोझ था न भविष्य की फ़िक्र थी। पढ़ाई के साथ साथ  हँसी, शरारत और हम सहेलियों की बेपरवाह दोस्ती ही हमारी पहचान थी।

यादों के इस सफ़र में जब टेन्ड फ्रेन्ड्स अपनी-अपनी सुलझी, शालीन यादें साझा कर रहे हैं, तो मुझे हँसी आ जाती है। सब बड़े शांत, गंभीर दिख रहे है या दिखने की सफल कोशिश कर रहे है। पर सभी जानते है के भीतर से अधिकतर बैचमेट्स शरारती थे लेकिन ऊपर से ऐसे बता रहे है जैसे कुछ किया ही नहीं। हमारे यूपी में ऐसे लोगों के लिए एक कहावत है “कंबल ओढ़ के घी पीना।”

लेकिन भई, हमारा ग्रुप ऐसा नहीं था हम थे खुलेआम हँसने वाले थे। हँसने-हँसाने के लिए तो हम मौके की तलाश में रहते थे। मैं, पूनम, प्रीति, संध्या और संगीता…

 जहाँ हम पांच,  वहाँ हंसी की आंच।

हालात कैसे भी हों, क्लास हो या गलियारा, मौका मिले तो हम हँसते मुस्कुराते ही रहते थे।

कॉलेज में क़दम रखने से पहले ही हमें सारी “इनसाइड जानकारी” मिल चुकी थी। वजह थीं हमारी श्रॉफ ग्रुप की बड़ी बहने: नीताबेन, लताबेन, लीनाबेन, सुधाबेन और स्मिताबेन। जो कॉलेज में हमारे सीनियर भी थे। उन्होंने कॉलेज के हर कोने, हर टीचर और हर नियम का नक्शा हमारे दिमाग़ में बैठा दिया था। उन्हीं में से एक खास सूचना यह थी कि जूलॉजी सब्जेक्ट जलिस मैडम पढ़ाएंगी। और हाँ, मैडम के कुछ शब्दों के उच्चारण को सुनने में स्टूडेंट धोखा खा जाते है। जैसे “ज़्यादा” को वो ऐसे बोलती थीं कि सुनने वाले को “ दादा” सुनाई देता था।

अब आप ही बताइए इतनी गंभीर जानकारी अगर हम पाँच सीधी सादी (?) लड़कियों के दिमाग़ में कॉलेज में कदम रखने से पहले बैठ जाए, तो क्या होगा? पहले ही हफ्ते जूलॉजी की क्लास लग गई थी। जलिस मैडम पढ़ाने आने वाले थे। हम सब पहले से ही अलर्ट मोड में थे। मैडम ने पढ़ाना शुरू किया…. और कुछ ही देर में वही शब्द ज्यादा आ गया जो हमें दादा सुनाई दिया। हम पाँचों ने एक-दूसरे की तरफ देखा  आँखें फैल गईं, होंठ भिंच गए, मुँह बंद, पर हँसी अंदर उफान मार रही थी पर जैसे तैसे अपने आप पर नियंत्रण रख रखा था। कुछ मिनट किसी तरह निकल गए। लेकिन दोबारा फिर वही शब्द ज्यादा का उच्चारण जो हमारे 

कानो में  दादा बनकर पड़ा। इस बार ज़रा ज़ोर से हमारी बंद मुँह की हँसी फूट पड़ी।

   मैडम ने हमारी हंसने की आवाज़ सुन ली। गंभीर नज़र से हमे देखा और सख़्त स्वर में बोली “आप सब बाहर जाइए !”

सर झुकाए (ताकि हमारा हंसता चहेरा मैडम को न दिखे) हम बाहर तो आ गए, पर हँसी कहाँ रुकने वाली थी… क्लास के बाहर खड़े-खड़े हम लोटपोट हो रहे थे। हमारी आंखों से हसी के आँसू बह रहे थे।

आज इतने साल बाद भी, जब वो घटना का कोई सहेली याद दिलाती है, तो  होंठों पर वही पुरानी, अल्हड़-सी हँसी लौट आती है।

तब भी हमारा उद्देश्य  गुरुजनों की किसीभी बात पर हंसना नहीं होता था लेकिन उस घटना पर हुआ था। शायद हमें पहलेसे यह बात बताई गई न होती तो शायद हमें हंसी भी न आई होती।

जलिस मैडम को सादर प्रमाण करते हुए आजका प्रकरण यही पर समाप्त करती हु।

😊🙏

सरोज श्रॉफ – पारेख

२८ 

मै सरोज श्रॉफ –पारेख फिर से एक यादों का प्रकरण लिख रही हु। यह प्रकरण पढ़कर आप सब लोग क्या सोचोगे इस विचार से लिखते हुए थोड़ी झिझक हो रही थी। पर फिर याद आया इस ग्रुप में तो सभी शरारती है, शायद  मै शरुआत करूं तो बाकी साथी भी अपनी शरारतें बेझिझक कहने लगे।

इस प्रकरण में सिर्फ नादानियत की घटना है। किसी के प्रति अनादर नहीं है।

तो दोस्तो,

हमारी उम्र तब कोई सत्रह बरस की रही होगी। तब न ज़िम्मेदारियों का बोझ था न भविष्य की फ़िक्र थी। पढ़ाई के साथ साथ  हँसी, शरारत और हम सहेलियों की बेपरवाह दोस्ती ही हमारी पहचान थी।

यादों के इस सफ़र में जब टेन्ड फ्रेन्ड्स अपनी-अपनी सुलझी, शालीन यादें साझा कर रहे हैं, तो मुझे हँसी आ जाती है। सब बड़े शांत, गंभीर दिख रहे है या दिखने की सफल कोशिश कर रहे है। पर सभी जानते है के भीतर से अधिकतर बैचमेट्स शरारती थे लेकिन ऊपर से ऐसे बता रहे है जैसे कुछ किया ही नहीं। हमारे यूपी में ऐसे लोगों के लिए एक कहावत है “कंबल ओढ़ के घी पीना।”

लेकिन भई, हमारा ग्रुप ऐसा नहीं था हम थे खुलेआम हँसने वाले थे। हँसने-हँसाने के लिए तो हम मौके की तलाश में रहते थे। मैं, पूनम, प्रीति, संध्या और संगीता…

जहाँ हम पांच,  वहाँ हंसी की आंच।

हालात कैसे भी हों, क्लास हो या गलियारा, मौका मिले तो हम हँसते मुस्कुराते ही रहते थे।

कॉलेज में क़दम रखने से पहले ही हमें सारी “ इनसाइड जानकारी ” मिल चुकी थी। वजह थीं हमारी श्रॉफ ग्रुप की बड़ी बहने: नीताबेन, लताबेन, लीनाबेन, सुधाबेन और स्मिताबेन । जो कॉलेज में हमारे सीनियर भी थे। उन्होंने कॉलेज के हर कोने, हर टीचर और हर नियम का नक्शा हमारे दिमाग़ में बैठा दिया था। उन्हीं में से एक खास सूचना यह थी कि जूलॉजी सब्जेक्ट जलिस मैडम पढ़ाएंगी। और हाँ, मैडम के कुछ शब्दों के उच्चारण को सुनने में स्टूडेंट धोखा खा जाते है। जैसे “ ज़्यादा ” को वो ऐसे बोलती थीं कि सुनने वाले को “ दादा ” सुनाई देता था।

अब आप ही बताइए इतनी गंभीर जानकारी अगर हम पाँच सीधी सादी (?) लड़कियों के दिमाग़ में कॉलेज में कदम रखने से पहले बैठ जाए, तो क्या होगा? पहले ही हफ्ते जूलॉजी की क्लास लग गई थी। जलिस मैडम पढ़ाने आने वाले थे। हम सब पहले से ही अलर्ट मोड में थे। मैडम ने पढ़ाना शुरू किया…. और कुछ ही देर में वही शब्द ज्यादाआ गया जो हमें दादा सुनाई दिया। हम पाँचों ने एक-दूसरे की तरफ देखा  आँखें फैल गईं, होंठ भिंच गए, मुँह बंद, पर हँसी अंदर उफान मार रही थी पर जैसे तैसे अपने आप पर नियंत्रण रख रखा था। कुछ मिनट किसी तरह निकल गए। लेकिन दोबारा फिर वही शब्द ज्यादा का उच्चारण जो हमारे 

कानो में  दादा बनकर पड़ा। इस बार ज़रा ज़ोर से हमारी बंद मुँह की हँसी फूट पड़ी।

मैडम ने हमारी हंसने की आवाज़ सुन ली। गंभीर नज़र से हमे देखा और सख़्त स्वर में बोली  “आप सब बाहर जाइए !”

सर झुकाए (ताकि हमारा हंसता चहेरा मैडम को न दिखे) हम बाहर तो आ गए, पर हँसी कहाँ रुकने वाली थी… क्लास के बाहर खड़े-खड़े हम लोटपोट हो रहे थे। हमारी आंखों से हसी के आँसू बह रहे थे।

आज इतने साल बाद भी, जब वो घटना का कोई सहेली याद दिलाती है, तो  होंठों पर वही पुरानी, अल्हड़-सी हँसी लौट आती है।

तब भी हमारा उद्देश्य  गुरुजनों की किसीभी बात पर हंसना नहीं होता था लेकिन उस घटना पर हुआ था। शायद हमें पहलेसे यह बात बताई गई न होती तो शायद हमें हंसी भी न आई होती।

जलिस मैडम को सादर प्रमाण करते हुए आजका प्रकरण यही पर समाप्त करती हु।

😊🙏

सरोज श्रॉफ – पारेख

४१ 

कॉलेज से पासआउट होने के बाद भी हमारी दोस्ती की डोर कभी ढीली नहीं पड़ी। मैं, प्रीति, पूनम और संध्या लगातार मिलते रहते थे। कभी किसी के घर तो कभी किसी छोटी सी बहानेबाज़ी के साथ बाहर निकल जाना हमारी आदत बन गई थी। कई बार प्रीति के घर पर कुछ और दोस्त भी इकट्ठा हो जाते थे। चाय की प्याली, हल्की सी हंसी और पुरानी शरारतों के बीच वक्त कब उड़ जाता था, पता ही नहीं चलता था। उन दिनों लगता था कि यह साथ हमेशा यूं ही बना रहेगा।

समय बीतता गया और घरों में धीरे धीरे शादी की चर्चाएं शुरू हो गईं। मां की आवाज़ में अब चिंता भी थी और उम्मीद भी। रिश्तेदारों के सवाल बढ़ने लगे और हमारे मन में भी एक अजीब सी हलचल होने लगी। एक दिन हम चारों साथ बैठे थे और यूं ही बातों बातों में यह सवाल निकल आया कि पता नहीं हम में से किसकी शादी पहले होगी। क्या हम सब एक दूसरे की शादी में पहुंच पाएंगे या नहीं। अगर पहुंचे तो गिफ्ट क्या देंगे। उस पल ये बातें बहुत गंभीर भी लग रही थीं और बहुत मासूम भी।

उसी मासूमियत में हमने एक अनोखा फैसला लिया। हमने तय किया कि सब बराबर योगदान करेंगे और बिल्कुल एक जैसी दीवार घड़ियां खरीदेंगे। भगत वॉच कंपनी से पांच घड़ियां ली गईं और उन्हें बड़े प्यार से गिफ्ट पैक कराया गया। एक घड़ी संगीता के लिए भी रखी गई और बाकी चार हमने अपने अपने पास रख लीं। इसका मतलब यह हुआ कि हमने एक दूसरे को नहीं बल्कि खुद को ही गिफ्ट दे दिया। उस वक्त यह विचार हमें बहुत समझदारी भरा लगा था। आज जब सोचती हूं तो बरबस हंसी आ जाती है कि हम कितने भोले थे और उसी भोलेपन में कितनी गहराई थी।

हम उन घड़ियों को देखते हुए अक्सर मज़ाक करते थे कि जब भी किसी की शादी होगी, वही घड़ी सबसे पहले गिफ्ट में दी जाएगी। कभी कभी यह भी सोचते थे कि अगर किसी की शादी देर से हुई तो घड़ी पुरानी तो नहीं हो जाएगी। फिर हंसकर कह देते थे कि दोस्ती पुरानी हो जाए तो भी उसकी कीमत कम नहीं होती। उन शामों में सपनों की कोई सीमा नहीं थी।

मेरी शादी के समय मैंने अपने कुछ खास दोस्तों को आमंत्रित किया था। आज सोचती हूं तो मन करता है कि वे दिन फिर से जी लूं। वैसे कौन कौन मेरी शादी में आया था, किस किस को याद है। अगर याद हो तो ज़रूर बताइएगा।

मेरी शादी में दोस्तों ने मुझे प्यारीसी एक दीवार घड़ी गिफ्ट में दी थी। वही घड़ी, जिस पर दो सुंदर सफेद बिल्लियों की तस्वीर बनी हुई थी। यह घड़ी मुझे किसने  दी थी याद नहीं, पर वह मेरे लिए और भी खास बन गई थी। वह सिर्फ एक गिफ्ट नहीं थी, बल्कि दोस्ती की एक प्यारी सी निशानी थी।

वह यादगार घड़ी साल दो हजार पांच तक कभी मेरे कमरे में तो कभी ड्रॉइंग रूम में लगी रहती थी। जब भी उस पर नजर पड़ती, मेरे चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ जाती और बीते हुए दिन आंखों के सामने घूम जाते थे।

कभी सुबह जल्दी उठते समय वही घड़ी मुझे कॉलेज के दिनों की भागदौड़ याद दिलाती थी। समय आगे बढ़ता गया। जिम्मेदारियां बढ़ गईं। घर बदल गए। शहर बदल गए। लेकिन यादों का वह कोना आज भी वहीं का वहीं रहा।

आज अचानक फिर सब कुछ याद आ गया। वे हंसी, वे सपने, वे डर और वह भरोसा कि हम हमेशा एक दूसरे के रहेंगे।

अब 21–22 फ़रवरी का इंतज़ार है। सभी से फिर मिलने की गहरी उत्सुकता मन में उमड़ रही है। ऐसा लगता है जैसे यह सब कुछ कल ही की बात हो।

✒️-सरोज श्रॉफ – पारेख

Scroll to Top