PROFILE : यादों का सफर
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Sumer Singh Bais
Mrs. Sandhya S Bais
- Birthday: 07 July
- Anniversary: 14 February
- Mumbai (MH)

यादों का सफर - प्रकरण ४६
कॉलेज के शुरुवाती दिनों मे, शाहपुर से बुरहानपुर के लिए चलने वाली बसों मे काफी भीड़ होती थी, दूसरी ओर वे उन्हे तभी चलाते जब वे पूरी भर जाती, बुरहानपुर के बस स्टैन्ड से कॉलेज के लिए चलने का समय अलग, ईसीके चलते कॉलेज पहुचने में देरी हो जाती। मैंने सोचा क्यों न साइकिल से कोशिश की जाए, मैंने साइकिल चलाना काफी देरी से सीखा यही कोई नौवीं क्लास में। शाहपुर से बुरहानपुर पहुचने मे लग जाता कोई पौना घंटा और बीच मे पड़ते थे दो पूल, एक मोहना नदी पर और दूसरा ताप्ती नदी पर. मोहना नदी का पुल छोटा था पर ताप्ती का संकरा और लंबा। ताप्ती नदी का पुल पार करना किसी कलाबाजी से कम ना होता। पसीने छूट जाते जब सामने से आता हुआ ट्रक और पीछे से आती हुई बस बार बार हॉर्न बजाते, बीच मे रोकना संभव ना होता और पैर नीचे ना टिकते। ऐसे लगता जैसे अब पुल से ही नीचे नदी मे गिर पड़ेंगे। कुछ दिन जैसे तैसे निकाले फिर वह प्रयोग मैंने बंद कर दिया। संजय चौहान की यह सहृदयता थी कि फिर बचे वर्षों में उसकी बुलेट से ही हम दोनों बुरहानपुर आने लगे।
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जब कभी खाने का डिब्बा साथ में नहीं होता तो लंच के लिए सबसे सस्ता और अच्छा एक ही उपाय होता पूरी सब्ज़ी। मोज़ीलाल की लेन में एक पूरी सब्जी की दुकान थी और उसी दौरान मिलन पूरी की दुकान भी नई नई खुली थी। एक प्लेट पूरी के साथ सब्जी फ्री, सब्जी अनलिमिटेड, तो दो-तीन बार सब्जी पर भी ताव मार लिया जाता। इस पतली तरीवाली सब्जी का टेस्ट ही कुछ अनोखा था। जब कभी संजय साथ में होता तो स्पेशल गोभी की सब्जी भी ऑर्डर होती थी। मैंने देश के अनेक हिस्सों में अलग अलग तरह की पुरीसब्ज़ी खाई है लेकिन बुरहानपुर की इस पतली तरी वाली सब्ज़ी का टेस्ट ही कुछ अलग है। इसका सीक्रेट मसाला क्या है यह भी एक रहस्य ही है।
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जबतक मेंढक डिसेस्क्शन पर बैन नहीं लगा तब कितने मेंढकों ने अपने प्राणों की बली दी होगी कहना कठिन है। पिछले दो प्रकरण आप सुन चुके अब मेरा सुनिए।
शाहपुर मे उस समय एक प्राथमिक स्वास्थ केंद्र हुआ करता था। वहाँ कार्यरत एक वार्ड असिस्टेंट मेरा परिचित था। मैंने उसे ऑपरेशन मेंढक का हिस्सा बनाने का फैसला किया क्योंकि वही अकेला व्यक्ति था जो ज़रूरी टूल्स, एनेस्थेटिक वगैरह ला सकता था। मेरी योजना से वह तुरंत सहमत हो गया शायद सर्जन बनने से तो रहे तो निरीह मेंढकों पर ही हाथ आजमा लिया जाए की भावना कही दबी छिपी हो।
लेकिन किसी जीवित मेंढक को पकड़ना आसान नहीं था। भविष्य मे कुत्सित जिज्ञासुओं से बचने के लिए अस्तित्व ने उनकी टांगों मे भी ईतनी ताकत भर दी है। जब बहुत दिनों तक अपराधी हाथ नहीं लगा तो योजना को ही ड्रॉप करने का विचार कर रहा था तब ही अचानक एक रविवार को ऑपरेशन सहभागी एक बैग लेकर घर या गया। उसके चेहरे पर एक गर्व भरी जीत वाली मुस्कान देख कर ही मै समज़ गया था कि उस बैग मे क्या हो सकता है।
हमने आनन फानन मे मेरे घर की छत पर एक कामचलाऊ इमरजेंसी ऑपरेशन थिएटर बनाया। उसने बैग खाली किया, उसमे अस्पताल से लाए औजार और क्लोरोफॉर्म की शीशी थी। हम कितने घातक रसायन के साथ खेल रहे थे इसका अंदाजा तब नहीं था। खैर जब बंदी को बाहर निकाला तो उसकी निरीह आंखे देखकर तो मेरे हाथपांव फूल गए लेकिन सहभागी तो पूरा मानस बनाकर ही आया था। मैंने उसे ही ऑपरेशन करने की छूट दे दी। क्लोरोफार्म का फाया सूंघते ही बंदी चारो खाने चित हो गया। सहभागी ने ऑपरेशन पूरा किया और टाँके भी लगाये। किसी की जिज्ञासा पूरी कर बंदी स्वर्ग को प्रस्थान कर गया।
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