PROFILE : यादों का सफर
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Sudarshana Jadhav
- Birthday: 04 March
- Burhanpur (MP)

यादों का सफर - प्रकरण २९
गोल्डन मीट की सुगबुगाहट होते ही हम सभी मानो फिर से 1978–79 के उस सुनहरे दौर में लौट गए हैं। समय की धूल में दबी हुई स्मृतियाँ अचानक जीवंत हो उठी हैं और मन फिर से उसी मासूम उम्र में जा पहुँचा है, जहाँ सपने, डर, उत्साह और सीख सब कुछ नया-नया था।
स्कूल के समय मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मैं कॉमर्स विषय लूँ, लेकिन सामयिक परिस्थितिवश ऐसा हो न सका और मैंने 12th बायोलॉजी साइंस से पूर्ण की। उस समय विषय चयन केवल इच्छा का नहीं, बल्कि परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों का भी प्रश्न होता था। पूरे बुरहानपुर में साइंस सब्जेक्ट का एकमात्र और सबसे अच्छा कॉलेज सैफी गोल्डन जुबली कादरिया साइंस कॉलेज ही था, अतः वहीं एडमिशन लिया।
मेरा एडमिशन कुछ देर से हुआ था और उस समय मेरे लिए रेगुलर कॉलेज जाना भी आसान नहीं था, क्योंकि ओनली गर्ल्स स्कूल से निकलकर पहली बार को-एजुकेशन के माहौल में जाना था। मन में उत्सुकता तो थी, पर उससे कहीं ज़्यादा डर और संकोच था। मैंने कॉलेज जाना शुरू तो किया, लेकिन मैं बहुत डरी-सहमी रहती थी, क्योंकि मैंने सुन रखा था कि कॉलेज में रैगिंग होती ही है। हर नया दिन मेरे लिए एक अनजानी चुनौती जैसा होता था।
इसी डर के बीच एक दिन कॉलेज के होम साइंस विभाग की दो लड़कियों ने मुझे रोका और अपने पास बुलाया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैं बहुत घबराई हुई उनके पास गई। उन्होंने मुझे एक पासपोर्ट साइज फोटो दिखाकर पूछा,
“क्या इसे जानती हो?”
मैंने हाँ में सिर हिलाते हुए, बड़े ही डरते हुए, उन्हें देखा। वह फोटो मेरी ही थी। उस पल मन में न जाने कितने सवाल और आशंकाएँ उमड़ पड़ीं। लेकिन मुझे डरा हुआ देखकर उन्होंने मुस्कराकर मुझे अपने पास बड़े स्नेहवश बैठाया, मेरा नाम, ईयर और अन्य सामान्य बातें पूछीं। फिर उन्होंने बहुत सहजता से समझाया कि बताओ, यह फोटो हमें कैसे मिली होगी। ऐसी लापरवाही ठीक नहीं होती। अपनी महत्वपूर्ण चीज़ों को इस तरह इधर-उधर रखना ठीक नहीं है, इन्हें संभालकर रखा करो।
उनका व्यवहार डाँट से कहीं ज़्यादा एक बड़े बहन जैसा था—संवेदनशील, समझदार और मार्गदर्शक। उन दो छात्राओं में से एक कल्पना दीदी थीं और दूसरी दीदी का नाम मैं आज भूल गई हूँ, लेकिन उनका स्नेह और वह घटना कभी नहीं भूल पाई। उस दिन मेरे मन से कॉलेज और सीनियर्स को लेकर बैठा हुआ डर काफी हद तक निकल गया।
इस छोटी-सी घटना ने मुझे जीवन भर का सबक दिया और मेरी सोच भी बदल दी कि हर बार सीनियर्स बुरे नहीं होते। कई बार वे हमारे मार्गदर्शक, रक्षक और शुभचिंतक भी होते हैं। आज भी जब उस घटना को याद करती हूँ तो खुद पर हल्की-सी हँसी भी आती है और उन दोनों दीदियों को तहे दिल से धन्यवाद देने का मन करता है।
सच तो यह है कि इस गोल्डन मीट ने हमारे कॉलेज की ऐसी न जाने कितनी गोल्डन यादों का पिटारा खोल दिया है। यादें, जो समय के साथ धुंधली तो हुई थीं, लेकिन मिटी नहीं थीं। आज वे फिर से उतनी ही चमकदार लग रही हैं, जितनी कभी उस दौर में हुआ करती थीं।
*सुदर्शना जाधव*
