PROFILE : यादों का सफर

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Purnima Shroff

Mr. Shroff
  • Birthday: 14 Novemberr
  • Anniversary: 10 February
  • Indore (MP)
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यादों का सफर - प्रकरण १७

*East or West – My Batch is the Best* 

सबकी यादें पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे मैं आज भी कॉलेज के उन्हीं गलियारों में खड़ी हूँ। आँखों के सामने वही दृश्य तैर रहा है … ताप्ती का सुंदर किनारा, उससे लगा हुआ ऐतिहासिक किला और किले की दीवार से सटा हमारा कॉलेज। इतना सुंदर वातावरण था कि जो पढ़ने के मूड में न भी हो, वह भी पढ़ने लग जाए।

कॉलेज लाइफ का असली आनंद तो फर्स्ट ईयर में भरपूर लिया। बालकनी टाइप क्लासरूम, खिड़कियों से दिखता बॉटनिकल गार्डन का मनोरम दृश्य, और हवा के हर झोंके के साथ गार्डन से आती खुशबू से मन को फ्रेशनेस देता था। एनुअल फंक्शन, इलेक्शन कैनवासिंग की धमाल, हँसी-मज़ाक, शरारतें और न जाने कितनी कही-अनकही यादें आज भी दिल के किसी कोने में दबी हुई हैं।

साइंस के प्रैक्टिकल्स तो जैसे कॉलेज जीवन की पहचान थे। फिजिक्स लैब में गति से जुड़े प्रयोग, केमिस्ट्री लैब में टाइट्रेशन, बॉटनी लैब में सेक्शन कटिंग और फ्लावर फैमिलीज़, तथा जूलॉजी लैब में पायला, फ्रॉग और अर्थवर्म के डिसेक्शन साथ ही प्रैक्टिकल एग्ज़ाम और वाइवा का हल्का-सा डर और मन में ढेर सारी उत्सुकता रहती थी *इन्हीं सब के बीच बॉटनी प्रैक्टिकल एग्ज़ाम की एक याद आज भी बड़ी दिलचस्प लगती है।* 

आज उसी याद को मैं लिख रही हूँ। इसे पढ़कर कोई थोड़ा नाराज़ हो सकता है पर मैं रिस्क लेकर लिख रही हु क्योकि मुझे विश्वास है कि पंकज इस बात को स्पोर्टली लेगा। 😊

हुआ यूँ कि बॉटनी का प्रैक्टिकल एग्ज़ाम था। ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद सेकंड ईयर या फाइनल ईयर की बात रही होगी। आप सभी जानते हैं कि बॉटनी प्रैक्टिकल में लैब के बाहर जाली वाले गलियारे में स्पॉटिंग एग्जाम में दस स्पॉट रखे होते थे, जिन्हें  पहचान कर उनके पॉइंट्स लिखने होते थे।

पंकज का रोल नंबर मेरे बाद में था। एक-दो स्पॉट शायद वह पहचान नहीं पाया था या पॉइंट्स याद नहीं आ रहे होंगे। उसी समय उसने मुझसे कहा:

“पूनम, इन स्पॉट के पॉइंट्स दिखा ज़रा।” 

उसकी बात सुनते ही मैं स्तब्ध हो गई थी। तब मन में आया था “इसे ऐसा कहने की हिम्मत कैसे हुई?”

मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा ही था कि वह तुरंत बोल पड़ा “ अरे, नंबर्स में तेरी कॉम्पिटिशन थोड़ी है मेरे साथ, तू तो स्कॉलर है।” 

उस एक वाक्य में आग्रह भी था, मुस्कान भी, और थोड़ी-सी चालाकी भी। मैं मन ही मन मुस्कुरा उठी थी।  टैब अनुभव हुआ था की “ज़रूरत के समय इंसान कितनी सहजता से अपनी सीमाएँ लांघ लेता है।”

अब आप सोच रहे होंगे “फिर क्या हुआ?

क्या पूनम ने पंकज को पॉइंट्स बताए?

हाँ, मैंने अपनी आंसर बुक में इस तरह लिखना शुरू किया कि पंकज पॉइंट्स देख सके। उसने कितने स्पॉट्स के पॉइंट्स देखे, यह मुझे पता नहीं क्योंकि उस समय मेरे पास इतना समय ही नहीं था कि मैं कहीं और ध्यान दे सकूँ।

I hope Pankaj, you won’t mind 😊

ऐसी और भी कई छोटी-मोटी यादें हैं, जो मन के पन्नों में आज भी अंकित हैं।

फिर कभी उन्हें भी साझा करूँगी।

— पूर्णिमा श्रॉफ / शाह

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