PROFILE : यादों का सफर
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Mamata Shroff
Mr. Suhas Mayur
- Birthday: 15 January
- Anniversary: 18 December
- Nashik (MH)

यादों का सफर - प्रकरण २६
मै ममता श्रॉफ — नासिक से
यादों का सफ़र —
समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, इसका एहसास तब होता है जब जीवन की ज़िम्मेदारियों का बोझ हल्का होने लगता है और यादें या तो अचानक याद आती है या कोई याद दिलाता है सबकी लिखी हुई यादें पढ़कर मुझे भी ऐसा लगा मानो बीते दिनों की तस्वीरें एक-एक कर जीवित हो उठी हों।
कॉलेज से निकले हुए आज पूरे चालीस–पैंतालीस साल बीत चुके हैं। तब हम सब अपनी अपनी राहों पर निकल पड़े थे। नौकरी, परिवार, दायित्व और संघर्षों के बीच कहीं न कहीं वो – कॉलेज के दिन मन के किसी कोने में चुपचाप सुरक्षित पड़े थे।
अब, सेवानिवृत्ति के बाद, अधिकतर जवाबदारियों से मुक्त होकर साठ–बासठ की उम्र में, फिर से उन यादों का गोल्डनमिट के रूप में मिलन होने जा रहा है। नए साल की यह शुरुआत मन में एक मीठी उम्मीद जगा रही है कि जैसे यह वर्ष भी उतना ही सुंदर और शुभ होगा।
स्कूल से निकलकर कॉलेज जाने की उत्सुकता तो थी ही, पर साथ में एक हल्का-सा डर भी था। जैसे कोई अनजाना सफ़र शुरू होने जा रहा हो। पहले साल में खुद को ढालने में थोड़ा समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे सब सहज होता चला गया था। साथी छात्र-छात्राएँ सरल, संस्कारी और मदद करने वाले थे; अपनापन अपने आप बनता चला गया था।
एक सहेली ने यादों में लिखा है कि लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ना कितना सुकून देता था, सही लिखा था। दूसरी बात यह कि घर दूर होने के कारण रोज़ घर जाकर खाना खाकर फिर कॉलेज आना आसान नहीं था। तब आठ-दस सहेली, मै–ममता श्रॉफ, जयश्री, ममता जैन, कल्पना जैन, साधना शाह, गिरिबला, रक्षा, दर्शना, आभा और जागृति ने मिलकर एक छोटा-सा फ़ैसला लिया कि हम घर से खाना लेकर आएंगे और पहले साल की बालकनी वाली कक्षा के बगल में ही बोटेनिकल गार्डन मे बैठकर वहीं, रिसेस में या कॉलेज पूरी होने के बाद और प्रैक्टिकल्स के पहले हम सबके टिफ़िन खुलेंगे।
आहाहा.. क्या खूब सूरत पल होते थे वे। चारों और भिन्न भिन्न फूल और आकर्षक पौधे और टिफिन में भिन्न भिन्न व्यंजन होता था। जैसे किसी मल्टी क्यूज़ीन फाइव स्टार रेस्टोरेंट का खाना हो। मन और भूख दोनों तृप्त हो जाते। साथ में हँसी-ठिठोली होती और दिन का थकान भरा बोझ हल्का हो जाता।
कॉलेज की स्थिति मानो प्रकृति ने स्वयं स्नेहपूर्वक सँवार कर रखी हो। हमारा कॉलेज नदी के तट से काफ़ी ऊँचाई पर स्थित था, जहाँ से नीचे बहती नदी का दृश्य आँखों को ठहर जाने पर विवश कर देता था। कॉलेज की रेलिंग वाली खुली बालकनी से झाँकते ही चाँदी-सी चमकती नदी की धार मन को मोह लेती थी।
नदी के एक ओर स्थित सेतु के पास जाकर यह दृश्य और भी निखर उठता था। नदी, आकाश और धरती का अद्भुत संगम आँखों में बस जाता, जिसे भुला पाना सहज नहीं था। उस ऊँचाई से नदी में तैरती नावें और किनारों पर चहल-पहल करते लोग किसी बच्चे की खिलौनों भरी दुनिया जैसे प्रतीत होते थे कभी-कभी आसमान में उड़ते पक्षियों से भी अधिक ऊँचाई से पक्षियों को उड़ता देखने का दृश्य एक अलौकिक आनंद दे जाता… मानो मन स्वयं पंख लगाकर उड़ने लगा हो। पास ही ऐतिहासिक किला था, जहाँ कभी-कभी कॉलेज के बाद टहलने चले जाते थे। पहला साल सचमुच यादगार रहा।
प्रैक्टिकल के समय भी असुविधा जैसी कोई बात नहीं होती थी। मेरे पहले ही गुप्ताजी का रोल नंबर था। कई बार उनकी मदद से काम आसान हो जाता था।
बायोलॉजी लैब में तो मज़ेदार किस्से भी जुड़े हैं वो सब हम मिलने पर साझा करेंगे!
अब फिर से गोल्डनमिट में मिलने का समय आ रहा है। पुरानी हँसी, भूले-बिसरे नाम और वो छोटी-छोटी बातें सब मिलकर एक बार फिर ताज़ा होंगी। यह यादों का सफ़र अभी थमा नहीं है; बल्कि अब तो लगता है कि यह नए उत्साह के साथ फिर से शुरू होने वाला है।
सभी साथियों को मेरा नमस्कार🙏
— ममता श्रॉफ मयूर
