PROFILE : यादों का सफर

18

Pankaj Shah

Mrs. Deena P Shah
  • Birthday: 18 February
  • Anniversary: 06 December
  • Vyara (GUJ)
18 pankaj

यादों का सफर - प्रकरण ०१ ०८ ३२ ४३४४

०१

शायद जुलाई महीने के दूसरे या तीसरे सप्ताह का समय था।

बी.एस-सी. द्वितीय वर्ष की ज़ूलॉजी की असद क़ुरैशी सर की कक्षा में सभी छात्र रोचक विषय में पूरी तन्मयता से डूबे हुए थे।

सर भी पढ़ाने की पूरी लय में थे।

मैं अपने मित्र सुदेश और राजीव के साथ तीसरी बेंच पर, खिड़की के पास बैठा था।

बाहर झर-झर बरसते सावन ने वातावरण में हल्की ठंडक फैला दी थी।

भीगती हुई मिट्टी की सुगंध मन को पुलकित कर रही थी।

तभी पीरियड समाप्त होने की घंटी बज गई।

असद सर के चहरे पर भी विषय अधूरा रह जाने का अफसोस झलक रहा था।

निराशा में उन्होंने हाथ में पड़े चॉक के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, अपनी छतरी उठाई और कक्षा से बाहर चले गए।

मैंने मस्ती में एक गीत की पैरोडी गुनगुनानी शुरू कर दी—

चॉक के टुकड़े-टुकड़े करके,

छाता लेके चल दिए…

जाते-जाते ये तो बता दो,

ये काम आएँगे किसके लिए…”

उन दिनों मुझ पर फिल्मी गीत पर पेरोडी करने का नया नया शौक जगा था।

परंतु,

मेरा दुर्भाग्य कि असद सर उसी समय खिड़की के पास से होकर जा रहे थे, जब मैं यह पैरोडी गुनगुना रहा था।

उन्होंने समझ लिया कि मैं अपने दोस्तों के साथ उन पर कटाक्ष कर रहा हूँ। उन्होंने नाराज होकर मुझे खूब डाटा। मैंने लाख कोशिश की उन्हें समझाने की कि सर, मुझे पैरोडी करने की “कुटेव” है और यह तो सहज ही मुँह से निकल गई थी—

लेकिन मैं उन्हें समझाने में असफल रहा।

और जब तक वे कॉलेज में रहे, वे हम तीनों से नाराज़ ही रहे,

हमारा मित्रता-भरा संबंध समय से पहले ही समाप्त हो गया।

मेरी इस शरारत का खामियाज़ा मेरे दोनों दोस्तों को भी कुछ हद तक भुगતना पड़ा।

यह घटना जब भी याद आती है, तो समझ आता है कि—

एक शब्द के कई अर्थ होते हैं,

समझ में एक आता है,

बाक़ी सब व्यर्थ होते हैं,

इसी से बड़े-बड़े अनर्थ होते हैं।

और कुछ लोग तो

अर्थ का अनर्थ करने में समर्थ होते हैं। 

०८ 

मेरे घर में देसी पान खाना कोई फैशन या दिखावे की चीज़ नहीं थी बल्कि रोज़मर्रा की सादगी भरी आदत का हिस्सा था। पान यूँ ही मुँह में रख लिया जाए ऐसा कभी नहीं होता था। मम्मी खुद पान के पत्ते चुनती थीं। पत्ते पर हल्का-सा चुना कत्था लगाने के  बाद शुरू होता असली स्वाद और सेहत का मेल।

पान में घरेलू स्वास्थ्य के लिए हितकारी वस्तुए जैसे अजवाइन, सौंफ, सुआ, धना दाल, इलायची, कभी-कभी सूखी गुलाब की पंखुड़ियाँ, मौसम के अनुसार ज़रा-सा गुलकंद या मिश्री—सब कुछ बहुत सीमित मात्रा में। न कोई रंगीन मसाला, न बाजारू मिठास। मम्मी कहा करती थीं, “ये पान पेट के लिए है, शौक के लिए नहीं।” वही पान घर में सब खाते थे—बड़े भी, छोटे भी। उस स्वाद में अपनापन भी था और घरेलू समझ भी।

कॉलेज के दिन थे। सुबह की थ्योरी क्लास लगभग ग्यारह बजे छूट जाती थी। उसके बाद साढ़े बारह के आसपास  प्रैक्टिकल हुआ करता था। यह बीच का समय  मैं कॉलेज से सीधे घर आ जाता, खाना खाता और फिर प्रैक्टिकल के लिए लौट जाता। खाना खाने के बाद पान खाना  स्वाभाविक था। एक पान घर पर खा लिया और एक पान चुपकी जेब में रख देता।

उस समय मुझे इसमें कोई गलती नज़र नहीं आती थी। 

एक दिन बॉटनी का प्रैक्टिकल चल रहा था। लैब में पौधों के नमूने रखे थे, स्लाइड्स तैयार हो रही थीं, माइक्रोस्कोप पर आँखें टिकाए छात्र छात्राएं अपने-अपने काम में डूबे थे। फॉर्मेलिन की गंध और सन्नाटे में चलती हल्की-हल्की आवाज़ें सब कुछ परिचित-सा था। प्रैक्टिकल लंबा खिंच रहा था और ध्यान कहीं-कहीं भटकने लगा। उसी आदत के चलते मैंने जेब से पान निकाला और चुपचाप मुँह में रख लिया।

मुझे नहीं लगा था कि किसी की नज़र पड़ेगी। ऐसा हर प्रेक्टिकल में करता था।

लेकिन सलीम सर ने देख लिया था।

उन्होंने न तो ऊँची आवाज़ में टोका, न सबके सामने मेरा नाम लिया। बीच प्रैक्टिकल में ही वे मेरे पास आए और बहुत सामान्य स्वर में बोले, “पहले मुँह साफ़ कर लो, फिर प्रैक्टिकल करना।”

एक पल के लिए दिल ज़ोर से धड़क उठा। लगा कि अब सबकी निगाहें मुझ पर टिक जाएँगी, फुसफुसाहट होगी, हँसी उड़ेगी। लेकिन सलीम सर ने ऐसा कुछ होने ही नहीं दिया। वे आगे बढ़ गए, जैसे कोई साधारण निर्देश देकर चले हों।

मैं बाहर गया, पान थूका, मुँह धोया और वापस आकर अपने स्थान पर खड़ा हो गया। प्रैक्टिकल फिर से शुरू कर दिया। *उस समय तो मैं खुली शर्मिंदगी से बच गया था, लेकिन भीतर कहीं गहरा असर हो चुका था।* 

सलीम सर ने मुझे पूरे बेच के सामने ऊंचे स्वर में डाटा नहीं, उन्होंने मुझे हल्के स्वरमे कहा वह भी बिना भाषण दिए। *उनके ऐसे व्यवहार ने मुझ पर मनोवैज्ञानिक रूप से असर डाला। मुझे अपनी गलती का एहसास डर से नहीं, आत्मसम्मान के साथ हुआ।* उस दिन समझ आया कि अनुशासन सिखाने के लिए डाँटना ज़रूरी नहीं होता, कभी-कभी चुपचाप सही दिशा दिखा देना ही काफी होता है।

शायद यही वजह थी कि *सलीम सर* हम सबको इतने प्यारे थे। वे कभी छात्रों को नीचा दिखाकर खुद ऊँचे नहीं बनते थे। उनकी सख़्ती में भी इंसानियत थी और उनकी नरमी में भी अनुशासन। ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं से हम समझ जाते थे कि वे सिर्फ़ बॉटनी नहीं पढ़ा रहे थे, हमें जीवन का व्यवहार भी सिखा रहे थे।

आज जब उस दिन को याद करता हूँ, तो पान का स्वाद नहीं, सलीम सर की समझदारी याद आती है और वही स्मृति उन्हें मेरे लिए हमेशा आदरणीय बना देती है।

✒️पंकज अज्ञानी — 20.12.2025

३२

कुछ मित्रों के आग्रहवश “यादों का सफ़र” में “चॉक के टुकड़े-टुकड़े…” वाली पूरी पैरोडी को मेरे संग्रह के पिटारे से निकालकर प्रस्तुत करता हु।

उस दिन असदसर के पीरियड समाप्त होते ही एक पैरोडी का मुखड़ा अचानक मेरे मुँह से निकल पड़ा था। उस क्षण तो वह बस एक सहज-सी प्रतिक्रिया थी, लेकिन बाद में मैंने उसी मुखड़े को गीत के शब्दों और लय में पिरोकर पूरी पैरोडी का रूप दे दिया। सबसे पहले वह मैंने संजय चौहान को सुनाई। संजय को मेरी पैरोडी बहोत पसंद आती थी। वह न सिर्फ खुलकर हँसता, बल्कि उसने मुझे भरपूर प्रोत्साहन भी करता था। 

(यदि आप यू ट्यूब पर ” दादा ” मूवी का गीत ” दिल के टुकड़े टुकड़े करके, मुस्कुरा कर चल दिए ..” सुनकर ये पढोगे तो ये पैरोडी का और अधिक आनंद आएगा)

👇👇

पैरोडी गीत

(तर्ज: “दिल के टुकड़े-टुकड़े करके, मुस्कुराके चल दिए…”)

चॉक के टुकड़े-टुकड़े करके,

 छाता लेके चल दिए…

जाते-जाते ये तो बता दो,

          काम आएँगे ये किसके लिए…

चॉक के टुकड़े-टुकड़े करके,

          छाता लेके चल दिए…

चेप्टर तैयार कर, आए थे घर से,

अधूरा न रह जाए,  बस इस डर से।

               जल्दी-जल्दी सर पढ़ाने लगे थे,

घंटी ने बजकर गड़बड़ सब कर दी,

ये सोच में उनकी साँसें ही भर दी,

                       के चेप्टर को फिर से पढ़ना पड़ेगा।

पढ़ाई का ग़ुस्सा मन में दबाके,

         मुझ पे झल्ला कर चल दिए….. चॉक के टुकड़े… (१)

खिड़की से सावन  झर-झर बरसे,

अधूरा चैप्टर और सिलेबस के डर से,

                   बौखला गया था मन उनका तबसे।

“सर, कल पढ़ाएँगे क्या?”    जो हमने पूछा,

भौंहें चढ़ाईं, तिरछी नज़रों से देखा,

                      “चुपचाप बैठे रहो,” बोले वो सबसे।

       पढ़ाई के मारों को, पढ़ाई के मालिक,

              डाँट-फटकार के चल दिए…चॉक के टुकड़े…… (२)

कॉपी खुली थी,  कलम रुकी थी,

सबकी निगाहें  बोर्ड पे टिकी थीं,

              क्लास से रुख़सत होने ही वाली थी

नोटबुक को  हमने  बेंच पे जो पटका,

धीरे से लगा उनको ज़ोरों का झटका,

    आवाज़ उनकी कुछ और तेज़ हो गई थी।

ज्ञान की गंगा बहाने वाले सर,

         डाँट बरसाकर चल दिए… ३

चॉक के टुकड़े-टुकड़े करके,

                      छाता लेके चल दिए… 

जाते-जाते ये तो बता दो,

            काम आएँगे ये किसके लिए…

वैसे ही आर्गेनिक केमेस्ट्री की क्लास चल रही थी… मीथेन – इथेन की श्रंखला के बारे में ज्ञान मिला था। उत्सुकता वश घर जाकर आगे की श्रृंखला देखी तो फिर एक और तुकबंदी तैयार हो गई थी। इसबार की पैरोडी “रटने के लिए”  पहाड़े ( टेबल –  दो एका दो – दो दूनी चार) के रूप में बनी थी।👇

एक कार्बन मीथेन,  

             जिसकी सबसे हल्की शान

 दो कार्बन इथेन, 

              जो  है गैसों  की पहचान

 तीन कार्बन प्रोपेन, 

                ये है जलने  में  महान

 चार कार्बन ब्यूटेन, 

             हर घर के चूल्हे की है जान

 पाँच कार्बन पेंटेन, 

            इसका  है  सुंदर तरल  रूप

 छह कार्बन हेक्सेन, 

               ये  तो  है  रसायन में खूब

 सात कार्बन हेप्टेन, 

                  सभी मानक का है मान

 आठ कार्बन ऑक्टेन, 

                 जो है शक्ति की पहचान

 नौ कार्बन नॉनेन,  

                 करता गुणवत्ता परीक्षण 

 दस कार्बन डेकेन , 

              पहाड़े का पूरा हुआ भ्रमण

✒️ पंकज शाह “अज्ञानी”

४३

भावुक-सा है मन मेरा, न ज्ञानी न चतुर,

“पंकज अज्ञानी” का जग है मित्रो से भरपूर।

आज मैं यादों के उस सफर में लौट रहा हूँ, जो कादरिया कॉलेज ने मुझे अपने कुछ अनमोल मित्रों के रूप में दिए। अगर जीवन में आने वाले सारे दोस्तों की बात लिखूं, तो एक लंबी किताब बन जाएगी। लेकिन मैं यहाँ संक्षिप्त रूप में, अपनी बेच के कुछ दोस्तों के बारे में दो प्रकरणों (प्रकरण – ४३ और ४४) में लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।

हमारी दोस्ती की एक टोली कोई साधारण टोली नहीं थी, पूरा चलता-फिरता “कॉलेज का संयुक्त परिवार” था।

उन्हीं में से एक है ” सुदेश जयसिंघानी। हसमुख, बिंदास और दिल का ऐसा साफ कि उसकी हँसी सुनकर सबसे उबाऊ दिन भी त्योहार बन जाए।

आज भी साफ़ याद है वो पहला दिन, जब उससे पहली बार मुलाक़ात हुई थी। मुझे देखते ही बिना किसी औपचारिकता के उसने सीधा सवाल दाग दिया था..

“तू बी.एससी. फ़र्स्ट में है ना?”  उस एक सवाल ने जैसे बातचीत का दरवाज़ा खोल दिया, और फिर रोज रोज की बातें  मुलाकाते होती गईं। दिन बीतते गए, साथ बैठना, साथ हँसना, साथ में कॉलेज आना–जाना,पिक्चर और छोटी-छोटी बातों पर बहस करना… और कब वो जान-पहचान गहरी दोस्ती में बदल गई, पता ही नहीं चला।   कॉलेज में मेरा पहला दोस्त वही बना, और ऐसा बना कि आज तक दोस्ती के रजिस्टर का पहला पन्ना उसी के नाम है।  

पहले दो साल तो मेरी पढ़ाई लगभग सुदेश के घर ही रही थी।  वहीं सोना, वहीं पढ़ना, वहीं सपने देखना हमारी दिनचर्या हो गई थी। मूड बदलने के लिए कभी ग्रामोफोन पर पुराने गीत सुनते, तो कभी टेपरिकॉर्डर में शोले की कहानी सुनते-सुनते आँख लग जाती। और आंटीजी के हाथ का नाश्ते का क्या कहने! लगता था किताबों का सारा तनाव एक प्लेट नाश्ते में घुल गया हो। पढ़ाई के साथ-साथ रोज़ नित-नए स्वाद और स्नेहभरे नाश्ते का भी भरपूर लुत्फ उठाते थे।” सुदेश का घर मेरे लिए दूसरा घर बन गया था। 

फिर मिला राजीव खेडेकर हिंदी का जादूगर, हिंदी के ऐसे उस्ताद कि अगर उस समय अमीन सयानी रिटायर हो जाते तो सीधे इन्हें रेडियो पर बैठा देते। बोलें तो मख्खन जैसा, लिखें तो शहद लगे। ऐसा उदात्त स्वाभिमान कि जो कुछ भी उनसे होकर गुजरता, वह सम्मान से दीप्त हो उठता।

मैं राजीव से अक्सर वाद–विवाद कर बैठता था। बातों में तर्क, अपनी-अपनी जिद और सोच की टकराहट भी खूब होती। पर उसकी बोली की छटा और हृदय की विशालता के आगे अंततः मुझे ही हार माननी पड़ती।

उसकी बात कहने का अंदाज़ ऐसा था कि असहमति भी मधुर लगने लगती। 

राजीव से मैने सीखा कि बहस में सही होना ज़रूरी नहीं, सही बने रहना ज़रूरी है। शायद इसीलिए उससे हुई हर तकरार के बाद भी मन में उसके लिए स्नेह और बढ़ जाता था।

हम तीन — मैं, सुदेश और राजीव  ऐसे जुड़े कि लोग हमें “थ्री-इन-वन पैक” कहने लगे।

इसी बीच  प्रफुल कपाड़िया की एंट्री हुई। हमारा त्रिकोण अचानक चतुर्भुज हो गया। भाई साहब बलिष्ठ ऐसे कि उनके साथ खड़े हो जाओ तो अपने आप अंदर का हीरो जाग जाता था। उसके साथ रहने पर हमें लगता था कि अब तो कही भी *पंगा* लेना “संवैधानिक अधिकार” हो गया है। वो हमारे त्रिकोण का चौथा कोण था। कद-काठी ऐसी कि उसके साथ खड़े होते ही हम सब अपने-आप को बाहुबली समझने लगते थे।

और आख़िर में जुडा अभय शाह। बी एस सी के तीसरे साल में मिला, मगर ऐसे मिला जैसे बचपन से  साथ में हों। पढ़ाई का धुरंधर और प्रखर विद्वान था।  उस के आते ही हमारा ग्रुप पेंटागन बन गया था। पाँच कोण, पाँच स्वभाव, और हज़ार किस्से। 

एक दिन फिजिकल केमिस्ट्री का पीरियड था। समीकरण ऐसे कि सिर के ऊपर से हवाई जहाज़ निकल जाए।

सुदेश ने कहा, “आज अणु-परमाणु के भार को बाद में समझेंगे, पहले थोड़ी पेट पूजा जरूरी है।”

राजीव ने एंकर अंदाज़ में घोषणा की—“मित्रों, कक्षा त्याग ही आज का धर्म है।” और हम पाँचों सीधे निकल  कॉलेज के बाहर निकल गए थे उस जगह जहाँ कॉलेज कैंटीन तो थी नहीं, पर आज़ादी की खुशबू जरूर होती थी। जब भी ऐसी क्लास बंक होती उस दिन के सब्जेक्ट का अभय हमे ज्ञान देता था।

एक बार बॉटनी की फैमिली स्टडी के लिए हम रॉवर के पास पाल नामक जगह गए थे। वहां पौधे कम देखे, मस्ती ज्यादा हुई थी। वहीं एक टेकरी पर चढ़ते वक्त मेरा पैर फिसल गया था। एक पल को लगा था कि मेरी कहानी खत्म!!! अगर उसी क्षण प्रफुल के मजबूत हाथों ने मुझे न संभाला होता, तो सच कहता हूँ “इस गोल्डन मीट में आप लोग मेरी याद में श्रद्धांजलि सभा कर रहे होते।”

उस दिन समझ आया कि दोस्त सिर्फ हँसने के लिए नहीं, गिरने पर थामने के लिए भी होते हैं।

प्रफुल के खेत वाली “ऐतिहासिक दावत” सबसे मजेदार किस्सा रही थी। यह तय हुआ था के हम पाँचों अपने हाथों से खाना बनाएँगे। हमारा जोश ऐसा था कि मानो हम मास्टरशेफ फाइनल के प्रतिस्पर्धी हो!

मुझे चावल की खीर बनाने की जिम्मेदारी मिली थी। मैंने पूरे आत्मविश्वास से दूध उबलते ही चावल, शक्कर और इलायची—तीनों एक साथ डाल दिए।

परिणाम?

दूध घटता गया, मगर चावल ने पकने की नाम नहीं लिया। अंत में जैसी भी बनी हो , वो  खीर कम और “मीठा प्रयोग” ज्यादा लग रही थी। वही अधपकी खीर खाकर हमने पेट भरा, और  चारों दोस्तो की भरपूर गालियाँ भी मुझे खानी पड़ी।

घर जाकर भाभी ने मुझे ज्ञान दिया के खीर बनाने में शक्कर सबसे आखिर में डालते हैं।”

उस दिन समझ आया कि रसोई भी एक प्रयोगशाला है।

मेरी ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर बीएससी फाइनल का था। माइग्रेन के भयानक अटैक के कारण मैं पढ़ाई छोड़ने तक का मन बना चुका था। तब यही चारों दोस्त ढाल बनकर मेरे साथ खड़े हो गए थे। खासकर अभय ने बहुत हिम्मत दी थी। हमारा अभय के  घर रात-रात भर पढ़ाई का सिलसिला चलता था। कई बार वह खुद चाय बनाकर हमें पिलाता, बीच बीच में  अंधेरी रातो में सुनसान सड़कों पर टहलने निकल पड़ते थे। और अभय मुझे बिना स्ट्रेस के पढ़ने के तरीके समझाता था। कई बार उसने अपनी पढ़ाई छोड़ कर कुछ चैप्टर मुझे शिष्य बनाकर पढ़ता था।

उन दिनों अगर ये टोली साथ न होती, तो शायद मेरी पढ़ाई की कहानी वहीं खत्म हो जाती। ये यादें मेरे लिए सिर्फ किस्से नहीं, जीवन की अमानत हैं, मेरे लिएचिर स्मरणीय।

जब भी हम मिलते हैं तो वही दिन लौट आते हैं…

सुदेश के घर की महक, राजीव की रेडियो वाली आवाज, प्रफुल के हाथों की वह पकड़, अभय की दी हुई हिम्मत, और हमारी अधपकी खीर जैसी मासूम शरारतें।

वक्त ने सब कुछ बदला, पर एक चीज़ वैसी ही रही

            हम पाँच जहाँ 

       ठहाकों का ताज वहाँ!

कुछ और मित्रों की बाते कल के प्रकरण में।

✒️पंकज “अज्ञानी”

४४

यादों का सफर प्रकरण 43 को आगे बढ़ाते हुए, सबसे पहले मेरे लिए “दोस्ती का मुकम्मल चेहरा”

राजेश की बात करता हु।

राजेश बजाज: हमारी मित्रता छठी कक्षा से शुरू हुई और वक़्त के साथ और गहरी होती गई। राजेश पढ़ाई-लिखाई में अव्वल भी था और ख़ुशहाल भी था।

यह ग्यारहवीं कक्षा की बात है। कान के ऑपरेशन के कारण मैं दो महीने स्कूल नहीं जा सका था। मेरी फीस बाकी थी। क्लास टीचर पटियाला सर ने भरी क्लास में वजह पूछी, तब राजेश ने कहा था;

“सर, पंकज बीमार है। मैं कल उसके घर से फीस ले आऊँगा।” मगर अगले दिन उसने किसी को बताए बिना अपने ही पैसों से मेरी पूरी फीस भर दी थी। स्वस्थ होकर जब मैं रेगुलर स्कूल जाने लगा, तब भी राजेश ने मेरी दो महीने की फीस का ज़िक्र मुझसे नहीं किया। जब फीस जमा करने वाले दिन मैं घर से तीन माह की फीस लेकर सर के पास गया, तब मालूम हुआ कि दो माह की मेरी फीस राजेश ने जमा कर दी थी। पैसे लौटाते वक्त जब मैंने उससे पूछा कि इतने दिनों से इस बारे में मुझे बताया क्यों नहीं, तो उसने निर्लेप अंदाज में बस इतना कहा;

“हाँ, ठीक है न, कौन-सी बड़ी बात हुई।”

जब भी यह बात याद आती है, तो अंग्रेज़ी कहावत “A Friend in Need Is a Friend Indeed” याद आ जाती है। सच ही कहा गया है कि “दोस्ती जताई नहीं जाती, निभाई जाती है।”

एक दूसरी घटना…. इंदौर में पीएमटी देने मैं बाफना हॉस्टल में ठहरा था, जबकि वह होलकर कॉलेज हॉस्टल में रहता था। एक दिन मैं उससे मिलने गया और बस इतना कहा कि मैं भी पीएमटी देने वाला हूँ। यह जानते हुए भी कि पीएमटी परीक्षा बिल्कुल सिर पर थी, उसने बिना एक पल सोचे अपने कई नोट्स मेरे हाथ में थमाते हुए कहा “इसे भी पढ़ लेना।”

समझ नहीं आता कि इस घटना को “ Joy of Giving” कहूँ, या “ Care for a Friend” कहूँ या “Thinking for a Friend”; क्योंकि इसमें तीनों भाव एक साथ समाए हुए हैं। उसके साथ ऐसी कई यादें है।

इसीलिए राजेश ने जब थर्ड ईयर में हमारी क्लास में एडमिशन लिया, तो मुझे बहुत खुशी हुई थी। लेकिन कुछ ही समय बाद उसका आयुर्वेदिक कॉलेज में प्रवेश हो गया, इसलिए साइंस कॉलेज में उसका साथ ज़्यादा दिनों तक नहीं रह सका।

शेख मजीद : मेरा एक अनन्य दोस्त के बारे में मैं यक़ीन से नहीं कह सकता कि *संघर्ष* उसकी क़िस्मत में लिखा था, या वह खुद ही “आ बैल मुझे मार” की तरह चुनौतियों को बुला लेता था। मगर इतना ज़रूर है कि मुसीबतों से भागना उसने कभी सीखा ही नहीं था। हालात चाहे जैसे रहे हों, वह सीना तानकर खड़ा हो जाता था। शायद ज़िंदगी के प्रति उसका मंत्र यही रहा होगा के…

लहरों से डर के नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

मजीद की सबसे अलग पहचान उसका “बावा” बोलने का अपनापन भरा अंदाज़ था। मुझसे मिलते ही सबसे पहले ऐसे गले लग जाता जैसे बरसों की दूरी को एक पल में मिटाना हो। उसकी हँसी भी बिल्कुल उसी की तरह खुली और बेबाक थी; मुँह खोलकर दिल से हँसता तो माहौल अपने-आप हल्का हो जाता था।

उसकी मौजूदगी में कभी औपचारिकता टिक नहीं पाती थी। बातों में सादगी, व्यवहार में गर्मजोशी और दोस्ती में गहराई मजीद की असली दौलत थी। वह सिर्फ मिलता नहीं था, हर मुलाकात को यादगार बना देता था। कुछ लोग रिश्ते निभाते हैं, और कुछ लोग रिश्तों को जीते हैं। मजीद रिश्तों को जीनेवालों में से एक था।

दीपक पवार से मुलाकात हमेशा बड़ी प्यारी होती थी। उसके साथ बैठना किसी अपने से मिलने जैसा लगता था। उसमें न कोई दिखावा था, न कोई औपचारिकता थी। वह सचमुच एक वर्सेटाइल मित्र था, यानी सबका मित्र था। हर उम्र, हर स्वभाव और हर सोच के लोगों से उसका सहज जुड़ाव था। उसकी सबसे खास बात यह थी कि वह कभी किसी के ज्ञान, पद या धन-दौलत से प्रभावित नहीं होता था। उसके लिए इंसान की कीमत उसके दिल से होती थी, हैसियत से नहीं। इसलिए उसके रिश्तों में बराबरी और अपनापन रहता था। आज भी उससे वैसा ही सहज रिश्ता है जैसे कॉलेज काल में था।

राजकुमार मेहता से मेरी कई बार “तू-तू मै-मै” होती थी पर उसकी बातचीत में हमेशा ठहराव और व्यवहार में गहरी शालीनता रहती थी। वह बहुत बोलता था पर जो बोलता दिल से बोलता था।

कई बार उसके हाथों में टेबल टेनिस की बेट देख कर मन ललचाता के मै भी यह खेल खेलु, पर तब मुझे टेबल टेनिस खेलना नहीं आता था। अब मैं अच्छी तरह खेलता हु और तमन्ना है कि इस खेल में उससे मै कभी जीत जाऊ ।

श्रीचंद थावानी का स्वभाव ही अलग रंग लिए था। चेहरे पर सदा हल्की मुस्कान, बातों में अपनापन और मिलने में भरपूर आत्मीयता रहती थी। वह रिश्तों को बड़े मन से निभाने वाला इंसान था।

उसकी एक खूबी यह थी कि वह हर व्यक्ति को सम्मान देता था। उसकी संगत में बैठकर लगता है कि *उसका साथ यह यक़ीन दिला देता था कि रिश्तों की सच्ची गरमाहट ही जीवन को अर्थ देती है।*

संजय चौहान सचमुच बहुत अच्छा मित्र था। उसकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह मेरी छोटी-से-छोटी प्रतिभा को भी पूरे दिल से महसूस करता था। मेरी पैरोडी को वह बड़े चाव से, तन्मय होकर सुनता था। वह सिर्फ सुनता ही नहीं था परन्तु खुलकर सराहता और आगे लिखने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करता था। उसकी तारीफ़ में औपचारिकता नहीं होती थी, बल्कि सच्चा अपनापन झलकता था। कई बार तो उसके दो शब्द ही नया लिखने का हौसला बन जाते थे। *ऐसे दोस्त बहुत कम मिलते हैं, जो आपकी कला में भरोसा जगाएँ, आपको थोड़ा और बेहतर बनने का साहस दें। संजय उन्हीं अनमोल साथियों में से एक है।*

शशिकांत कोठीवाला संगीत का साधक और बैंजो का माहिर उस्ताद था। उसके हाथों में बैंजो आते ही सुर जैसे अपने-आप मुस्कुराने लगते। संगीत उसके लिए केवल शौक नहीं, उसका जुनून भी था। स्वभाव से बेहद मिलनसार था और हर किसी से सहजता से घुल-मिल जाना उसकी खासियत थी।

प्रदीप श्रॉफ मित्रों की इन यादों में कॉलेज काल का एक ऐसा व्यक्तित्व भी है, जिसकी मित्रता की चाह मेरे मन में नौवीं कक्षा की एक घटना से जन्मी थी। तीसरी कक्षा में किसी छोटी-सी बात पर हम दोनों में जो “कट्टी” हुई थी, उसका असर बरसों तक बना रहा। आज न उसे उसका कारण याद होगा, न मुझे; पर वह बाल-सुलभ नाराज़गी पूरे विद्यार्थी जीवन पर जैसे एक परछाईं बनकर छाई रही। हम सामने होते हुए भी दूर थे, परिचित होकर भी अपरिचित थे।

फिर एक दिन उसके बड़प्पन ने सारी दूरियाँ मिटा दीं। उसने अपने बेटे की शादी का न्योता भेजकर बरसों से बंद पड़ी दोस्ती की खिड़की फिर खोल दी थी। और मेरे मित्र-कोष में हँसमुख, स्पष्टवक्ता और निखलास व्यक्तित्व का एक अनमोल रत्न जुड़ गया।

भारत भूषण पांडे: बी.एससी. प्रथम वर्ष में एक लंबा-सा लड़का था, जिसके बारे में मुझे इतना ही याद है कि वह क्रिकेट का दीवाना था। तब हमारे बीच कोई गहरी दोस्ती नहीं बन पाई थी। उस वक़्त यह बिल्कुल एहसास नहीं था कि यही शख़्स आगे चलकर मन में इतना सम्मान जगा देगा। कुछ साल पहले प्रदीप के बेटे की शादी में अचानक उससे मुलाकात हुई। थोड़ी ही देर की बातचीत में महसूस हुआ कि यह इंसान तो दोस्ती की असली परिभाषा को जीने वाला है। उसी पल दिल में एक अजीब-सा अफ़सोस जागा कि इतने बरसों तक मैं भारत भूषण पांडे जैसे इंसान से दूर कैसे रहा? क्यों उसके भीतर के नेक, सच्चे और खरे दोस्त की पहले पहचान न हो सकी? कुछ रिश्ते भले देर से खुलते हैं, पर खुलते ही सीधे दिल में जगह बना लेते हैं।

जगदीश बांदिल मेरे साथ तीनों साल पढ़ा। रोज़ का मिलना-जुलना था, पर रिश्ता ज़्यादातर औपचारिक ही रहा “कैसे हो?”, “क्या चल रहा है?” जैसी सामान्य-सी बातें होती थी। भोपाल के गेट-टूगेदर में जब बरसों बाद उससे मुलाकात हुई, तब पहली बार लगा कि मैं जिस व्यक्ति को बस एक सहपाठी समझता रहा, उसके भीतर कितना निर्मल और सादा दिल छिपा है। लगभग डेढ़ घंटे तक चली हमारी बातचीत में न कोई बनावट थी, न औपचारिकता थी। उसकी बातों में ठहराव, सोच में सकारात्मकता और व्यवहार में अपनापन था। लगा जैसे वर्षों का अधूरा परिचय उस एक मुलाकात में पूरा हो गया।

जगदीश के साथ भी मेरे लिए देर से ही सही, पर एक अच्छे इंसान से मिलने की सच्ची खुशी मिली।

मेरे कॉलेज काल में और भी कई मित्र थे; किशोर मर्चेंट, दिलीप मेहता, कुतुबुद्दीन, सिद्दीकी आदि थे। उनका स्मरण आज भी हृदय को स्पंदित कर देता है, पर समय की धुंध में बहुत-सी बातें अब स्पष्ट याद नहीं रहीं । फिर भी उन सबकी मौजूदगी ने मेरे जीवन को जो रंग दिए, उनकी महक आज तक मन में बसी है।

अंत में मेरे सभी दोस्तों के लिए मेरी ये चार लाइन:-

दोस्तों की यादों का मैं क्या हिसाब रखूँ,

हर लम्हा ऐसा है कि पूरी किताब लिखूँ।

तुम्हारे साथ से “अज्ञानी” का सफ़र आसान हुआ,

तुम्हारी दोस्ती से ही “जन्नत” मेरा “जहान” हुआ।

✒️ पंकज “अज्ञानी”

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