PROFILE : यादों का सफर
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Rajesh Bajaj
Mrs. Ranjana R Bajaj
- Birthday: 04 May
- Anniversary: 25 December
- Burhanpur (MP)

यादों का सफर - प्रकरण २४
मैं, डॉ. राजेश बजाज,
इस ग्रुप के कवियों की कविताएँ पढ़ते-पढ़ते मेरे भीतर सोया हुआ शायर भी जैसे अचानक जाग उठा…और शब्द बिना दस्तक दिए
दिल के आँगन में उतर आए—
मैं पल-दो-पल का ही साथी था, पल-दो-पल ही मेरी हाज़िरी थी, पल-दो-पल में दोस्ती हुई थी, और पल-दो-पल में ही जैसे सदियाँ जी ली थीं…
शब्द जब थमे,तो यादों के झरोखों से मन ने झाँकना शुरू किया। और हर बार जब उस दौर की ओर लौटता हूँ, मन के किसी कोने में आज भी एक हल्की-सी टीस धीरे-धीरे करवट बदलती है। देर से पहुँचना कोई ग़लती नहीं थी,अफ़सोस तो बस इतना है, कि वक़्त ने ठहरने का मौका नहीं दिया… अफ़सोस इस बात का नहीं कि मैं उस क्लास में देर से पहुँचा,अफ़सोस इस बात का है कि इतनी बेहतरीन, अपनत्व से भरी और समझदार क्लास के साथ पूरे तीन वर्ष बिताने का अवसर मुझे नहीं मिला।
क्योंकि—
कुछ रिश्ते सालों में नहीं बनते,कुछ रिश्ते एक नज़र में मुकम्मल हो जाते हैं,वे समय से नहीं,एहसास से गहरे होते हैं…
पी.एम.टी. की तैयारी के उद्देश्य से मैंने इंदौर के होलकर कॉलेज में बी.एससी. के प्रथम और द्वितीय वर्ष पूरे किए।
सपने बड़े थे,मेहनत सच्ची थी,पर जब परिणाम मनचाहे नहीं आए,तो बी.एससी. फ़ाइनल ईयर के लिए क़िस्मत मुझे बुरहानपुर ले आई।
क़िस्मत ने रास्ता बदला,पर दिल को सही ठिकाना दे दिया…यह जुड़ाव भले ही पढ़ाई के अंतिम वर्ष में हुआ,
पर अपनापन पहले ही दिन दिल में उतर गया। स्कूल के पुराने साथी—
राजकुमार, दीपक और पंकज—से फिर मिलना मानो बीते दिनों की गर्माहट को
एक बार फिर
जी लेने जैसा था। और सबसे खूबसूरत बात यह रही कि नए चेहरों के बीच कभी परायापन महसूस नहीं हुआ।
कुछ लोग नए होते हुए भी,अजनबी नहीं लगते,और कुछ रिश्ते,पहले ही पल अपने हो जाते हैं…कुछ ही दिनों में
इस क्लास ने मुझे अपना लिया,जैसे मैं बरसों से इसी बैच का हिस्सा रहा हूँ।आपसी समझ, सादगी,सहज हँसी-मज़ाक
और बिना कहे साथ देने का भाव—
यही इस क्लास की असली पहचान थी।
कॉलेज के दिन भी
अपनी छोटी-छोटी शरारतों के साथ यादों में बस गए।
स्कूटर से कॉलेज आने के कारण रैगिंग के नाम पर सिसोदिया और अन्य सीनियर्स ने कुछ सवाल पूछे।उस वक़्त सब सामान्य लगा,
पर घर पहुँचकर
स्कूटर की फटी हुई सीट देखी—तो मन कुछ पल खिन्न हुआ,फिर अपने-आप हँसी आ गई। कॉलेज लाइफ़ भी क्या ख़ूब होती है,
थोड़ी शरारत,थोड़ा सबक,और ढेर सारी यादें…कुछ स्मृतियाँ हमारे साथ उम्र भर चलती रहती हैं।
सलीम सर परीक्षा से पहले बॉटनी की कक्षा ले रहे थे। रेसिमोस और साइमोस पढ़ाते हुए उन्होंने प्रश्न किया—“एक्स्ट्रा एक्सिलरी साइम किसे कहते हैं?
जो उत्तर देगा,उसे प्रैक्टिकल में दो अतिरिक्त अंक मिलेंगे।”
मैंने उत्तर दिया—
जो एक्सिल के अतिरिक्त निकलता है,वही एक्स्ट्रा एक्सिलरी साइम कहलाता है।
सलीम सर का संतोष से भरा मुस्कुराता चेहरा आज भी स्मृतियों में उतना ही ताज़ा है।
कुछ मुस्कानें,अंक से ज़्यादा हौसला दे जाती हैं…
नागर सर का अंदाज़ तो आज भी मन में बसा है। ऑर्गेनिक केमिस्ट्री पढ़ाने की उनकी शैली ऐसी थी कि ग्लूकोज़ का ज्ञान
मानो रक्त में ही घुल गया हो—
शायद इसी कारण आज भी ब्लड शुगर थोड़ी बढ़ी हुई रहती है।
यह व्यंग्य नहीं,
यह उन गुरुओं के प्रति प्रेम है,जो पढ़ाते भी थे, और जीना भी सिखाते थे…
इसी बीच
करियर ने अचानक करवट बदली।आयुर्वेद कॉलेज, उज्जैन से बी.ए.एम.एस. में एडमिशन का कॉल आया। रास्ता फिर बदला,
और पूरे वर्ष नियमित रूप से बी.एससी. क्लास अटेंड करना संभव नहीं हो सका।
कुछ मोड़ ऐसे होते हैं,जहाँ सफ़र बदल जाता है,पर यादें वहीं ठहर जाती हैं…यही वह मोड़ था
जहाँ यह अपनापन अधूरा-सा रह गया।
मैं पल-दो-पल का ही सही,पर सच्चा साथी बनकर यादों में रह गया।
इतने कम समय में भी यह क्लास मेरे दिल में इतनी गहराई से बस गई कि आज भी उसे याद कर आँखें नम हो जाती हैं।
आज जब आप सबकी लिखी सुनहरी यादें पढ़ता हूँ, तो मन प्रसन्न भी होता है और कहीं-न-कहीं यह कसक भी उभर आती है—
काश!
मेरा साथ इस क्लास के साथ थोड़ा और लंबा होता। पर जो मिला, वही अनमोल है,क्योंकि हर रिश्ता,समय से नहीं,
सच्चाई से तौला जाता है…
वाह रे वक़्त!
एक झोंके ने हम सबको मिलाया था,और एक झोंके ने बिछड़ा भी दिया।
और अब जो हवा चली है,
वह झोंका नहीं—
एक शीतल, मंद पवन है,जो हमें फिर से जोड़ रही है।अब यह मिलन,यादों का उत्सव बने,और यह डोर,फिर कभी कमज़ोर न पड़े…
गोल्डन मीट हम सबके लिए अविस्मरणीय यादों कीनई इबारत लिखे—यही कामना है।मेरा आप सबसेविनम्र अनुरोध है कि आप भी अपनी-अपनी यादें साझा करें,ताकि यह यादों का सफ़र और भी समृद्ध हो सके।
आप सभी का
हृदय से आभार। 🙏
— डॉ. राजेश बजाज, बुरहानपुर
