PROFILE : यादों का सफर
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Sadhana Shah
Mr. Nitin Kapadia
- Birthday: 04 Decemberr
- Anniversary: 02 December
- Bhopal (MP)

यादों का सफर - प्रकरण २५
मैं साधना शाह–कपाड़िया भोपाल से।
कॉलेज के वे दिन आज भी मन के किसी कोमल कोने में वैसे ही सुरक्षित हैं, जैसे पुराने एलबम में हल्की पीली, पर भावों से भरी रखी हुई तस्वीरें..
हम कुछ खास सहेलियाँ थीं, गिरिबला, रक्षा, दर्शना और मैं।
कभी किसी के भी घर पर हम साथ साथ पढ़ाई करते थे। पढ़ने से ज़्यादा हमारा साथ होना ज़रूरी था। किताबें तो बहाना थीं, असल में हम एक-दूसरे के साथ जीवन के अनमोल पल बिता रहे थे। हँसी, बातें, छोटे-छोटे सपने सब कुछ साझा करते थे।
मेरे पापा कभी कभार टोक भी देते थे के “तुम देवियां पढ़ती भी हो के सिर्फ गप्पे हांकती हो”😊
कॉलेज के शुरुआती दिनों में कल्पना हाथीवाला और उसकी एक सहेली (जिसका नाम अब याद नहीं है) ने रैगिंग के नाम पर हमें खूब परेशान किया। तब डर भी लगा, कभी कभार आँखें भी भर आईं थीं। पर सच कहूँ तो उसी रैगिंग ने हमें थोड़ा मज़बूत भी बना दिया था। जीवन ने पहली बार सिखाया था कि हर मुस्कान आसान नहीं होती, और हर कठिनाई बेकार नहीं जाती।
हमारी बेमौसम बरसात की तरह एक और प्यारी साथी थी। उसका कोई ठिकाना नहीं रहता था। कभी साथ में आती, कभी न आती पर फिर भी हमारी मंडली में अपने आप ऐसे शामिल हो जाती थी जैसे दूध में शक्कर….। कुछ लोग बिना दस्तक दिए ही दिल में जगह बना लेते हैं, और बिना बताए ऐसे चले जाते है जहां से लौटकर आना संभव नहीं।
जी हां, मै स्व. जागृति घोड़े की बात कर रही हु। Miss you Jagruti❤️
हम बचपन से जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं बिलकुल सीधे-सादे। न उधो का लेना, न माधो को देना। फिर भी सभी से अच्छी मित्रता रही, खासकर सहेलियों से। शायद यही सरलता थी, जिसने रिश्तों को सहज रखा। इसी अपनत्व के कारण, जब सरोज कुछ वर्षों तक जीजाजी की सर्विस के चलते भोपाल में रही, तो उसके साथ बिताया समय बहुत अपना-सा लगा। कॉलेज की पहचान और वहाँ का अपनापन कुछ अलग ही होता है।
उन दिनों परिवार के बिना होटल जाना तो जैसे अघोषित नियम था।
एक दिन हम को बहुत भूख लगी। हिम्मत जुटाकर मोज़ीलाल होटल पहुँचे। पीछे कोई पहचान वाला न देख ले इस डर से सिर झुकाकर डोसा खाया। बिल चुकाने के बाद लगा, बच गए। पर घर पहुँचने से पहले ही खबर घर पहुँच चुकी थी। मेरे भाई फटकार ही रहे थे कि पापा आ गए। मैं भीतर तक सहम गई। अनुशासनप्रिय पापा का मन में डर जो था। पर उन्होंने पूरी बात शांति से सुनी और बस इतना कहा “ बहुत भूख लगी होगी, तभी गई होगी। यह कोई बड़ी बात नहीं है। साधना जानती है, उसे कब क्या नहीं करना चाहिए।”
उस पल मैंने अपने पापा के भीतर का वात्सल्य और विश्वास का एक और रूप देखा, अनुशासन के पीछे छुपा हुआ गहरा प्रेम अवर्णनीय है। आज भी वह वाक्य मेरे मन को सुकून देता है।
कॉलेज में न किसी से मेरी नोकझोंक हुई, न कोई बड़ा विवाद हुआ था न कोई विशेष घटना हुई जिसका वर्णन किया जाय। जीवन सरल बहता रहा था। पर आज जब सबकी पोस्ट पढ़ती हूँ, तो अनायास ही फ्लैशबैक में पहुँच जाती हूँ। वही चेहरे, वही हँसी, वही डर, वही अपनापन… सब फिर से जीवित हो उठता है। कुछ यादें बीतती नहीं… वे बस भीतर कहीं बैठकर, सही समय पर, हमारे मन को चुपचाप छू लेती हैं।
🙏
– – साधना शाह–कपाड़िया, भोपाल
