PROFILE : यादों का सफर

40

Shaikh Majid Siddique

Mrs. Sahmi M Siddique
  • Birthday: 06 February
  • Anniversary: 19 January
  • Burhanpur (MP)
40 majeed

यादों का सफर - प्रकरण ०३ २१ ३० ३३

०३

पंकज की यादों के सफ़र में एक बड़ा ही मज़ेदार लेकिन दिल को छू लेने वाला incident बार-बार सामने आ जाता है। फर्स्ट ईयर में हमारी क्लासें पहले बॉटनी गार्डन के बगल वाले कमरे में लगती थीं, लेकिन बाद में कॉलेज के साउथ की तरफ़ लम्बी ईस्ट–वेस्ट पट्टी जैसे बने कमरों में शिफ्ट हो गईं।

मैं और सिद्दीक़ हुसैन चौधरी जिस बेंच पर जमकर कब्जा जमाते थे, उसके ठीक आगे वाली बेंच पर साधना चोरे (Barole) और एक और लड़की बैठती थीं—उस बेचारी का नाम अब याददाश्त की भीड़ में कहीं खो गया है।

अब साधना की बात—साधना के बाल तो जैसे किसी पौराणिक कथा से उधार लिए हुए! लंबी, घनी चोटी… और उसकी उड़ान! साधना जब भी बेंच पर बैठती, एक झटके में चोटी पीछे फेंकती—और वो सीधी हमारे चेहरे को निशाना बनाती हुई ऐसे गिरती जैसे कोई ‘साँप 🐍’ अपनी जागीर पर दावा कर रहा हो।

कई बार हमने बड़ी विनम्रता से, तो कभी मन ही मन रोते हुए कहा भी—“साधना, ज़रा ध्यान…”

लेकिन दो दिन बाद वही ‘चोटी-आक्रमण’, वही हमारी हार, और वही उसकी जीत!

आख़िरकार हमने समझ लिया—यह चोटी नहीं, शायद उसकी “व्यक्तित्व की सीमा-रेखा” है।

हमने टोका-टाकी छोड़ दी। बस चुपचाप उसकी चोटी को अपने चेहरे से बचाकर बेंच के कोने में सजा दिया करते।

पूरा सेशन यूँ ही बीता… और यकीन मानिए, हमारी बेंच पर सबसे ज़्यादा ‘उपस्थिति’ अगर किसी की थी, तो वो साधना की चोटी की!

शायद साधना यह घटना भूल चुकी होगी—पर हम कैसे भूलें?

क्योंकि इस ‘चोटी-कांड’ का सबसे ज़्यादा असर तो हम पर ही हुआ था ना!

यदि शब्दों या वर्णन में कहीं कोई कमी रह गई हो तो विनम्र क्षमा चाहूँगा।

— माजिद   

२१ 

कॉलेज की ज़िंदगी में पढ़ाई कम और प्रयोग ज़्यादा होते थे। वो भी ऐसे प्रयोग, जिनका सिलेबस में कोई ज़िक्र नहीं मिलता। केमिस्ट्री की किताबों में जो बातें बड़े संजीदा अंदाज़ में लिखी होती थीं, उन्हें हम दिल से नहीं, शरारत से समझना चाहते थे। और इसी शरारत की जड़ में था ” *सोडियम* “।

टीचर ने बताया था कि सोडियम एक ख़तरनाक धातु है। हवा या पानी के संपर्क में आते ही रिएक्टिव हो जाता है, आवाज़ करता है, जलता है और कभी-कभी फट भी जाता है। यह सुनते ही हमारे भीतर का वैज्ञानिक नहीं, बल्कि भीतर का शैतान विद्यार्थी जाग गया। मन में बस एक ही सवाल था-“भई, आवाज़ कैसी आती है… ज़रा सुन तो लें!”

मेरे साथ इस महान वैज्ञानिक मिशन में शामिल था गणित फैकल्टी वाला  दोस्त *गुलाब देशमुख,* नेपानगर वाला। पढ़ाई में शांत, लेकिन कारनामों में पूरा मास्टर। दोनों की आँखें मिलीं और बिना बोले ही तय हो गया की आज किताबों की नहीं, हक़ीक़त की केमिस्ट्री देखी जाएगी।

किसी तरह एक काग़ज़ में सोडियम का छोटा-सा टुकड़ा लपेटा गया। इतना छोटा कि देखकर लगा “अरे इससे क्या ही होगा!” लेकिन दिल की धड़कनें ऐसे बज रही थीं, जैसे कोई बम हाथ में पकड़ा हो। हम दोनों चुपके से बॉटनी लैब के पीछे पहुँचे, जहाँ पीने के पानी का नल लगा था। जगह ऐसी कि न कोई टीचर, न कोई चौकीदार… बस हम, नल और सोडियम।

गुलाब ने चारों तरफ़ देखा, मैंने नल को घूरा। एक पल को लगा कि नल भी हमें शक की नज़र से देख रहा है। फिर मैंने नल खोला, गुलाब ने काग़ज़ खोला और सोडियम का टुकड़ा बड़ी श्रद्धा से नीचे रखा गया।

जैसे ही पानी की पहली बूँद गिरी

 *छन्न छन्न… फुस्स… चटाक चटाक…* !

अचानक ऐसी आवाज़ आई कि हमारी तो आत्मा तक काँप गई सोडियम जलने लगा, चिंगारी-सी निकली और ऐसा लगा मानो उसने कहा हो “क्यों बे, क्यों छेड़ा मुझे!”

हम दोनों एक साथ ऐसे पीछे हटे जैसे किसी ने करंट लगा दिया हो। गुलाब बोला,“अरे भाग… ये तो सच में जल रहा है!”

मैं बोला, “मैंने कहा था न, किताबें झूठ नहीं बोलतीं!”

पल भर में डर गायब हुआ और उसकी जगह हँसी ने ले ली। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, लेकिन चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जैसे कोई ओलंपिक जीत लिया हो। हमें लगा था कि यह महान वैज्ञानिक प्रयोग यहीं खत्म हो जाएगा।

लेकिन कॉलेज में कुछ भी गुप्त नहीं रहता। न जाने किसकी नज़र पड़ गई, और कुछ ही समय में यह महान उपलब्धि नगर सर तक पहुँच गई। फिर तो जैसे न्यायालय लग गया।

क्लास में बुलाकर ऐसी खिंचाई हुई कि सोडियम भी शरमा जाए।

 “लैब है या पटाख़ा फैक्ट्री?”

“नोबेल प्राइज़ की तैयारी चल रही है क्या?” “अगली बार पूरा कॉलेज ही उड़ा देना!”

हम सिर झुकाए खड़े थे, लेकिन अंदर ही अंदर हँसी रोकना मुश्किल हो रहा था। डाँट पड़ी, भाषण मिला और भविष्य में “वैज्ञानिक प्रयोग” न करने की हिदायत भी।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है कि वही नादान शरारतें कॉलेज जीवन की असली केमिस्ट्री थीं। सोडियम का वह छोटा-सा टुकड़ा हमें न वैज्ञानिक बना सका, न रसायनशास्त्री !! लेकिन ज़िंदगी भर हँसने लायक एक ज़बरदस्त किस्सा ज़रूर दे गया।

और सच कहूँ तो, अगर फिर से मौका मिले…तो शायद वही करेंगे—

बस इस बार नागर सर को पहले बता देंगे! 😄

३० 

दरअसल मैं, मजीद, कॉलेज के समय में, लालबाग रेलवे स्टेशन के पास रहता था। इसलिए मैंने BSc के दौरान कॉलेज की लाइब्रेरी के सामने वाले हॉस्टल की रो में एक बकमरा ले रखा था। उस समय खिरकिया, ज़िला खंडवा के दो लड़के भी हॉस्टल में मेरे साथ रहते थे।

एक बार वे दोनों लड़के दीपावली की छुट्टियों में अपने घर गए और वहाँ से कुछ रस्सी बम, पटाखे ले आए। आपको मालूम है कि हमारे कॉलेज में इंडोर बैडमिंटन और टेबल टेनिस का एक हॉल है। उसकी ख़ूबी यह थी कि उसमें ज़रा-सी आवाज़ भी कई गुना बढ़कर बहुत ज़्यादा सुनाई देती थी।

एक दिन मैं और खिरकिया के रहने वाले हॉस्टलर्स दशरथ सिंह पटेल और भगवत सिंह सोनर इंडोर हॉल में थे कि उन दोनों में से किसी ने मेरी जानकारी के बिना रस्सी बम में आग लगा दी। बम की इग्निशन वाली स्ट्रिप काफ़ी लंबी थी। वे बम में आग लगाकर हॉल के बाहर निकल गए। कुछ ही सेकंड में रस्सी बम ब्लास्ट हो गया। मैं अचानक ब्लास्ट के लिए तैयार नहीं था। घबरा कर हॉल के दरवाज़े के बाहर भागा।

उस समय कॉलेज के प्रिंसिपल एन. एस. बॉन्डे साहब हुआ करते थे। मुझे हॉल के दरवाज़े से बाहर निकलते हुए एन. एस. बॉन्डे के जासूस हरिराम नाई (राजेन्द्र भावसार – कॉलेज ऑफिस क्लर्क) ने देख लिया था।

प्रिंसिपल बॉन्डे साहब ऑफिस से तेज़ी में “कौन-कौन” बोलते हुए बाहर आए, लेकिन उन्हें मैं दिखाई नहीं दिया। बॉन्डे साहब ने ख़ुफ़िया तरीके से पता लगा ही लिया कि उस समय हॉल में माजिद मौजूद था, क्योंकि उन दोनों हॉस्टलर्स को तो कोई जानता नहीं था, सिर्फ़ हमारा ही नाम झंडे पर चढ़ा हुआ था।

रही-सही कसर राजेन्द्र भावसार  ने भी पूरी कर दी। मेरा नाम ठीक से याद न होने कारण *माजिद ख़ान* की जगह  *“मज़हर ख़ान”* करके बॉन्डे साहब को बता दिया।

कुछ दिन बाद नाम सुधार कर बॉन्डे साहब के ऑफिस में मेरी पेशी हुई। बॉन्डे साहब ने सीधे-सीधे मुझसे कहा,

“मज़हर ख़ान, (माजिद ख़ान) मैं तुमको कॉलेज से बाहर कर रहा हूँ, क्योंकि तुमने कॉलेज में बम फोड़ा है।”

मैं सिर हिलाते हुए बोलता रहा, “सर, मैंने बम नहीं फोड़ा है।” लेकिन मेरी सफ़ाइयाँ उनके सामने केवल बीन बजाना ही साबित हो रही थीं।

तब बॉन्डे सर ने कहा, “अगर तीन दिन में तुम्हारे पिता या घर के किसी ज़िम्मेदार आदमी को मेरे सामने कॉलेज नहीं लाए, हम तुम्हें कॉलेज से निकाल देंगे।”

मैंने कहा भी कि, “सर, मेरे पिताजी नहीं आ सकते। वे एक सीधे-साधे काश्तकार हैं, उन्हें खेती-किसानी से समय नहीं मिलता।” लेकिन बॉन्डे साहब कहाँ मानने वाले थे।

इसी उधेड़बुन में मैं प्रिंसिपल ऑफिस से बाहर निकल आया। परेशान था कि किसे परिवार का ज़िम्मेदार बनाकर बॉन्डे साहब की अदालत में पेश करूँ।

आपको याद होगा, कॉलेज में एक आसिफ़ुद्दीन शेख नाम का सीनियर BA का स्टूडेंट हुआ करता था। उसके बड़े भाई का नाम अनीस था। वह ज़्यादातर सऊदी अरब में रहता था। उस समय वह बुरहानपुर आया हुआ था।

आसिफ़ ने मुझसे कहा कि, “अनीस भाई को बॉन्डे साहब के सामने तुम्हारा भाई बनाकर पेश कर देते हैं, मामला ख़त्म हो जाएगा।”

काफ़ी सोच-विचार कर अनीस भाई को पूरा मामला समझाया गया।

दूसरे दिन अनीस भाई के साथ बॉन्डे साहब के ऑफिस में मेरी पेशी हुई। मैं डरते-काँपते बॉन्डे साहब के ऑफिस में अनीस भाई के पीछे-पीछे दाख़िल हुआ। 

लेकिन यह क्या!!!

बॉन्डे साहब और अनीस भाई एक दूसरे को देखा। दोनों की नज़रें मिलीं। अनीस भाई एकदम बॉन्डे साहब की तरफ़ बढ़ते हुए बोले,

“अरे बॉन्डे, तू कब से प्रिंसिपल बन गया?”

यह सुनकर मेरा कलेजा हलक़ को आ गया। मैंने सोचा, अनीस ज़रूर कॉलेज से मुझे निकलवाएगा। मैं नज़रें इधर-उधर फेरता रहा। लेकिन अनीस उनसे ऐसी बातें कर रहे थे जैसे बॉन्डे साहब उनके बचपन के मित्र हों।

कुछ लम्हों बाद परिस्थिति नॉर्मल होने के बाद अनीस भाई ने कहा,

“यार बॉन्डे, बच्चे को क्यों कॉलेज से निकाल रहे हो?”

इस पर बॉन्डे साहब ने अनीस भाई को पूरी बात बताई। अनीस भाई ने मुझे भी नसीहत दी। बॉन्डे साहब ने भी कहा, “मज़हर ख़ान, (माजिद ख़ान) आइंदा ऐसी कोई शरारत मत करना, जिससे तुम्हें भी परेशानी हो।”

मुझे बाद में मालूम हुआ कि बॉन्डे साहब अनीस भाई के पुराने दोस्त रहे थे, और उन्हीं के कारण बॉन्डे साहब का ग़ुस्सा कम हुआ था और इस परेशानी से मुझे राहत मिली थी।

लेकिन कुछ दिन बाद बॉन्डे साहब ने मुझे फिर से ऑफिस बुलवाया। बुलावा पाकर मेरा खून सूख गया। लेकिन इस बार बॉन्डे साहब ने मुझे नहीं डाँटा, बल्कि बड़े प्यार से कहा,

“मज़हर ख़ान, (माजिद ख़ान) चाहे जो भी सिचुएशन हो जाए, लेकिन कभी भी मेरे ऑफिस में तुम्हारे भाई अनीस को मत लाना।”

 *मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा था…?*

-मजिद

३३ 

1979 के ज़माने की बात है। उस समय खास तौर पर उन लड़कों को यह बात ज़रूर याद होगी जो कॉलेज जाते समय प्रफुल्ल कपाड़िया की “रतिलाल क्लॉथ स्टोर” के सामने, सड़क के किनारे स्थित “ *महाराज की चाय नाश्ते* ” वाली होटल पर अक्सर रुका करते थे। वह कोई बड़ी होटल नहीं थी, लेकिन वहाँ मिलने वाली चीज़ों का स्वाद आज भी जेहन में ताज़ा है। खासकर प्याज़ और हरी मिर्च के गरमागरम भजिये और उनकी मशहूर गोल्डन चाय।

मैं, सिद्दीक़ और कई बार पंकज व राजकुमार भी समय निकालकर वहाँ पहुँच ही जाते थे। कॉलेज की थकान, दोस्तों की बातें और सामने रखी गरम चाय हमारे लिए किसी दावत से कम नहीं होती थी। महाराज की होटल में बैठने की व्यवस्था भी बड़ी सादगी भरी थी। एक तरफ़ तीन छोटे टेबल थे और दूसरी तरफ़ भी तीन टेबल, जिनके साथ स्कूल के बच्चों जैसी छोटी दो सीटर बेंच लगी रहती थीं।

 *सिद्दीक़ और राजकुमार की लंबाई थोड़ी कम थी,* इसलिए उन्हें हम दीवार की ओर बैठा देते थे। *मेरी हाइट उनसे थोड़ी, शायद दो तीन इंच ज़्यादा थी, जबकि पंकज हाइट सलमान से ज्यादा और अमिताभ से थोड़ी कम थी।*

इसलिए पंकज और मैं हमेशा बेंच के बाहरी किनारे पर बैठते थे। पंकज की लंबी टाँगें टेबल के नीचे ठीक से नहीं समाती थीं।

महाराज की होटल का वेटर हमें अच्छी तरह पहचानता था और हमारे सीमित बजट से भी वह वाक़िफ़ था। इसलिए बिना पूछे ही दो फुल गोल्डन चाय और पचास पचास ग्राम भजियों का ऑर्डर दे देता था। अब दो फुल चाय को चार लोगों में बराबर बाँटना कोई आसान काम नहीं था। यह ज़िम्मेदारी सिद्दीक़ को मिलती थी, जो खुद को इंसाफ़ की तराज़ू से कम नहीं समझता था। वह बड़ी बारीकी से चाय को चार हिस्सों में बाँटने की कला जानता था।

हालाँकि बाँटते समय एक चालाकी ज़रूर हो जाती थी। सिद्दीक़ और राजकुमार कप में चाय अपने पास रखते थे और हमें सॉसर में चाय परोसी जाती थी। नतीजा यह होता था कि हमारी चाय जल्दी ठंडी हो जाती थी, जबकि उनकी चाय ज़्यादा देर तक गरम रहती थी। वे आराम से छोटी छोटी चुस्कियाँ लेते हुए चाय का आनंद उठाते रहते थे।

हम भी कहाँ हार मानने वाले थे। गरम भजिये निपटाने के बाद हम सॉसर वाली चाय जल्दी जल्दी पी लेते थे। उसके बाद मैं और पंकज मुँह साफ़ करते हुए काउंटर से नीचे उतर जाते थे। उधर सिद्दीक़ गरम चाय का पूरा मज़ा लेने के चक्कर में कुछ देर से काउंटर तक पहुँचते था। जैसे ही वह काउंटर पर पहुँचते, वेटर ज़ोर से बोलता था कि @ के छह रुपये लेना।

अक्सर ऐसा होता था कि बिल सिद्दीक़ को ही चुकाना पड़ता था। फिर भी उसने कभी कप में चाय पीना बंद नहीं किया। सच कहें तो वह हम सब से आर्थिक रूप से थोड़ा बेहतर स्थिति में था, इसलिए यह बात कभी बोझ नहीं बनी।

आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ जाती है।

सिद्दीक़, राजकुमार और पंकज का दिल से धन्यवाद, उन सुनहरे पलों की खूबसूरत संगत के लिए।

— मजीद

Scroll to Top